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Breaking News 9 January 2026

1 )  सोनम वांगचुक कब तक जेल में रहेंगे?

लोकतंत्र, असहमति और ‘राष्ट्र-सुरक्षा’ के बीच फँसा एक नाम...लद्दाख की बर्फ़ीली वादियों से निकलकर देश की अंतरात्मा तक अपनी आवाज़ पहुँचाने वाले Sonam Wangchuk आज उसी देश में जेल की सलाखों के पीछे हैं। सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि वह कब रिहा होंगे, सवाल इससे कहीं बड़ा है क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अब भी सुरक्षित है, या फिर असहमति को ‘ख़तरा’ मान लिया गया है? 26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को National Security Act के तहत हिरासत में लिया गया। यह वही कानून है, जिसमें बिना मुकदमा चले, बिना आरोप सिद्ध हुए, किसी व्यक्ति को महीनों तक जेल में रखा जा सकता है सिर्फ़ इस आधार पर कि सरकार उसे भविष्य में संभावित ख़तरा मानती है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें जोधपुर सेंट्रल जेल भेजा गया, जहाँ वह अब भी बंद हैं। इससे कुछ दिन पहले लद्दाख के लेह क्षेत्र में विरोध-प्रदर्शन हुए थे। प्रशासन का दावा है कि ये प्रदर्शन हिंसक हो गए और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई। सरकार का आरोप है कि सोनम वांगचुक के भाषणों और आंदोलनों ने लोगों को उकसाया, जबकि समर्थकों का कहना है कि वह हमेशा अहिंसक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखते रहे हैं। NSA कोई साधारण क़ानून नहीं है। यह Preventive Detention Law है यानी अपराध करने से पहले ही किसी को जेल में डाल देना। यहीं से बहस शुरू होती है। आलोचक कहते हैं कि यह कानून असहमति को दबाने का हथियार बन चुका है, जबकि सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी बताती है। सोनम वांगचुक का मामला इसी टकराव का सबसे ताज़ा उदाहरण है। सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की गई है। अदालत में सवाल उठाया गया है कि क्या एक शांतिपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता को NSA जैसे कठोर कानून के तहत बंद रखना संविधान के मूल अधिकारों के अनुरूप है? आज इस मामले पर सुनवाई तय है। फ़िलहाल, कोर्ट से रिहाई का कोई आदेश नहीं आया है, इसलिए वह अब भी जेल में हैं। सोनम वांगचुक की दलील ‘जाँच हो, लेकिन न्याय भी हो’ जेल से भेजे गए अपने संदेश में सोनम वांगचुक ने कहा कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें अपराधी की तरह पेश किया जाना अन्याय है। उनके अनुसार, लद्दाख की पहचान, पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों की बात करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य है।

 

2.) सड़क पर भीड़, हाथों में पत्थर, तुर्कमान गेट की हिंसक वारदात........

दिल्ली का ऐतिहासिक और संवेदनशील इलाका तुर्कमान गेट एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह बनी एमसीडी की अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई, जो देखते-ही-देखते पत्थरबाजी और हिंसक झड़प में बदल गई। यह घटना सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रही, बल्कि इसमें सामाजिक तनाव, प्रशासनिक तैयारी और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की परतें भी खुलती चली गईं। इस पूरे मामले में अब तक 5 आरोपियों की गिरफ्तारी, 14 दिन की न्यायिक हिरासत और जमानत पर सुनवाई जैसे अहम मोड़ सामने आ चुके हैं। घटना 7 जनवरी 2026 की रात की है, जब Municipal Corporation of Delhi (MCD) की टीम तुर्कमान गेट इलाके में फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद के आसपास अतिक्रमण हटाने पहुँची थी। कार्रवाई के दौरान इलाके में तनाव बढ़ा और देखते ही देखते स्थानीय भीड़ ने विरोध शुरू कर दिया। आरोप है कि इसी दौरान दिल्ली पुलिस और निगम कर्मियों पर अचानक पत्थरबाजी शुरू हो गई। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को पीछे हटना पड़ा और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा। इस हिंसक झड़प में कम से कम 5 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें एक थाना प्रभारी SHO भी शामिल बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, भीड़ ने न सिर्फ पत्थर फेंके बल्कि बैरिकेड्स तोड़ने की भी कोशिश की। घटना के वीडियो और CCTV फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसके बाद मामला और गंभीर हो गया। घटना के तुरंत बाद Delhi Police ने सख़्त रुख अपनाते हुए एफआईआर दर्ज की और वीडियो फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने बताया कि करीब 30 लोगों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें से 5 को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार आरोपियों पर सरकारी काम में बाधा, पुलिस पर हमला और दंगा भड़काने जैसी गंभीर धाराएँ लगाई गई हैं।
गिरफ्तार किए गए 5 आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल आरोपियों को जेल में रहना होगा। वहीं, जमानत पर सुनवाई आज 9 जनवरी 2026 को Tis Hazari Court में होनी है, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। जांच के दौरान मामला तब और संवेदनशील हो गया जब पुलिस ने बताया कि पूछताछ के दायरे में कुछ राजनीतिक कनेक्शन भी सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Mohibbullah Nadvi को भी पूछताछ के लिए समन भेजे जाने की तैयारी है। हालांकि, इस पर अभी अंतिम पुष्टि और आधिकारिक बयान का इंतजार है, लेकिन इस जानकारी ने सियासी हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की बात करें तो Bharatiya Janata Party ने पुलिस पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि “कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए।” वहीं दूसरी ओर Aam Aadmi Party ने प्रशासन से संवेदनशील इलाकों में संवाद और पारदर्शिता बनाए रखने की अपील की, ताकि हालात और न बिगड़ें। तुर्कमान गेट का इलाका पहले से ही इतिहास और संवेदनशीलता के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाइयाँ बिना पर्याप्त संवाद और सुरक्षा व्यवस्था के हों, तो हालात बिगड़ने की आशंका बनी रहती है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान स्थानीय लोगों को विश्वास में लेने की प्रक्रिया पर्याप्त थी? और क्या भीड़ द्वारा हिंसा किसी भी सूरत में जायज़ ठहराई जा सकती है? फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात है और पुलिस साफ कर चुकी है कि पत्थरबाजी में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। आने वाले दिनों में जमानत पर कोर्ट का फैसला और अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी इस मामले की दिशा तय करेगी।

 

3 ) क्या अब लालू यादव का पूरा परिवार जेल जाएगा?

सवाल ये है ...क्या देश के करोड़ों युवाओं की सरकारी नौकरी की उम्मीदों को ज़मीन के टुकड़ों से तौला गया?
क्या सत्ता का इस्तेमाल सार्वजनिक सेवा के लिए था या पारिवारिक संपत्ति खड़ी करने के लिए? और क्या अब अदालत ने उस साजिश की परतें खोल दी हैं, जिसकी चर्चा सालों से राजनीति के गलियारों में होती रही? दिल्ली की राउस एवेन्यू कोर्ट ने लैंड-फॉर-जॉब घोटाले में जो कहा है, वह भारतीय राजनीति और प्रशासन पर एक गंभीर सवाल है। अदालत के मुताबिक, शुरुआती सबूत यह संकेत देते हैं कि जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे 2004–2009 तक तब रेलवे में नौकरियों को एक तरह से बातचीत की मुद्रा बना दिया गया जहाँ नौकरी के बदले ज़मीन ली गई।

पूरा मामला क्या है? 

जांच एजेंसियों का आरोप है कि रेल मंत्रालय के अंतर्गत ग्रुप-D जैसी नौकरियाँ नियमों और प्रक्रियाओं को दरकिनार कर कुछ चुनिंदा लोगों को दी गईं। बदले में, उन उम्मीदवारों या उनके परिजनों से ज़मीनें बेहद कम कीमत पर या gift deed के ज़रिये लालू यादव के परिवार और करीबी सहयोगियों के नाम कराई गईं।
यही नहीं, आरोप यह भी है कि इन लेन-देन में कई बार बाजार मूल्य और दस्तावेज़ी कीमत के बीच भारी अंतर था, जो इस पूरे सौदे को संदिग्ध बनाता है। राउस एवेन्यू कोर्ट ने आरोप तय करते हुए साफ कहा कि यह कोई साधारण भ्रष्टाचार का मामला नहीं लगता, बल्कि आपराधिक साजिश के संकेत मिलते हैं। अदालत की राय में “रेल मंत्रालय का इस्तेमाल निजी हितों के लिए किया गया जैसे वह किसी एक परिवार की निजी जागीर हो।” यानी अदालत को prima facie यह दिखता है कि सरकारी पद का दुरुपयोग कर सार्वजनिक नौकरियों को निजी लाभ से जोड़ा गया। तो किस-किस पर आरोप तय हुए? इस मामले में अदालत ने लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, बेटी मीसा भारती और अन्य पारिवारिक सदस्यों व सहयोगियों समेत करीब 41 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए हैं। वहीं, करीब 52 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी भी किया गया जिससे यह साफ होता है कि अदालत ने हर नाम को एक ही तराजू में नहीं तौला।
जांच एजेंसियाँ क्या कहती हैं? इस केस की जांच CBI और ED कर रही हैं। CBI का दावा है कि भर्ती प्रक्रियाओं में नियमों की अनदेखी हुई जमीनों का ट्रांसफर परिवार के नाम योजनाबद्ध तरीके से कराया गया IPC की धारा 120B आपराधिक साजिश, 420 धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएँ लागू होती हैं ED इस पूरे नेटवर्क में मनी ट्रेल और अवैध संपत्ति की जांच कर रही है। क्या इसका मतलब सजा तय हो गई? नहीं। अदालत ने अभी सिर्फ आरोप तय किए हैं। इसका मतलब यह है कि अब ट्रायल चलेगा जहाँ CBI सबूत पेश करेगी, गवाहों के बयान होंगे और बचाव पक्ष को अपनी दलील रखने का पूरा मौका मिलेगा। दोषी ठहराए जाने या सजा तय होने में अभी वक्त लगेगा। तो राजनीतिक मायने क्या हैं? यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब बिहार की राजनीति पहले से ही उबाल पर है। RJD और समर्थक दलों का कहना है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध है और जांच एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है। वहीं, अदालत और जांच एजेंसियों का तर्क है कि उपलब्ध दस्तावेज़ और परिस्थितियाँ मुकदमे की सुनवाई को ज़रूरी बनाती हैं। तब तक सवाल वही है अगर सत्ता सेवा के लिए नहीं, सौदे के लिए इस्तेमाल हो, तो लोकतंत्र किस ओर जाएगा....