सुबह का वक्त था। स्कूल का हॉस्टल, रोज़ की तरह नाश्ता परोसा गया। बच्चों ने थाली उठाई, इडली-चटनी खाई… और किसी को ज़रा-सा भी अंदाज़ा नहीं था कि यही नाश्ता कुछ ही देर में बीमारी, अस्पताल और अफरा-तफरी में बदल जाएगा। आंध्र प्रदेश के पोलवरम इलाके में स्थित एक ट्राइबल वेलफेयर आश्रम स्कूल से आई यह खबर फूड पॉइजनिंग की है ...देवरापल्ली ट्राइबल वेलफेयर आश्रम हाई स्कूल के हॉस्टल में पढ़ने वाले 80 से ज्यादा बच्चे अचानक बीमार पड़ गए। नाश्ता करने के कुछ ही समय बाद बच्चों को उल्टियां होने लगीं, पेट में तेज़ दर्द उठा, कुछ बच्चों को दस्त शुरू हो गए और कई इतने कमजोर हो गए कि खड़े रहना मुश्किल हो गया। हॉस्टल में देखते-देखते चीख-पुकार मच गई। एक बच्चा संभलता, तो दूसरा फर्श पर बैठ जाता। शिक्षकों और स्टाफ को समझ ही नहीं आया कि अचानक इतने बच्चों को एक साथ क्या हो गया। हालात बिगड़ते देख प्रशासन हरकत में आया और बच्चों को तुरंत नज़दीकी अस्पतालों में ले जाया गया। अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक बीमार बच्चों की संख्या 80 से 92 के बीच है। किसी को रामपचोडावरम अस्पताल पहुंचाया गया, तो किसी को मेरेदुमिली। डॉक्टरों ने बताया कि कई बच्चों की हालत शुरुआती घंटों में गंभीर थी, लेकिन समय रहते इलाज मिलने से स्थिति काबू में आ गई। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि बच्चों ने नाश्ते में इडली और चटनी खाई थी, जो या तो खराब थी या ठीक से पकी नहीं थी। यानी गलती किसी एक प्लेट की नहीं, बल्कि पूरे किचन सिस्टम की थी। स्वास्थ्य विभाग ने तुरंत खाने और पानी के सैंपल जब्त कर लैब जांच के लिए भेज दिए, ताकि यह साफ हो सके कि ज़हर प्लेट में कैसे पहुंचा। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों में जो लक्षण दिखे, वे पूरी तरह से फूड पॉइजनिंग के क्लासिक केस हैं और ऐसे मामले आमतौर पर लापरवाही, गंदगी और निगरानी की कमी से जन्म लेते हैं। मामला सामने आते ही राज्य सरकार पर दबाव बढ़ा। मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने घटना को गंभीर बताते हुए सख्त कार्रवाई के आदेश दिए। शुरुआती कार्रवाई में हॉस्टल के कुक और डिप्टी वॉर्डन को सस्पेंड कर दिया गया। जांच के लिए टीम बनाई गई और भरोसा दिलाया गया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन सवाल सिर्फ सस्पेंशन का नहीं है सवाल उस व्यवस्था का है जो सस्पेंशन से पहले सोई रहती है। यह घटना इसलिए भी ज्यादा डराती है क्योंकि यह किसी प्राइवेट स्कूल की नहीं, बल्कि ट्राइबल वेलफेयर आश्रम स्कूल की है। ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अक्सर दूर-दराज़ के इलाकों से आते हैं, जिनके लिए हॉस्टल का खाना ही घर का खाना होता है। उनके पास विकल्प नहीं होते न बाहर से खाना मंगाने का, न शिकायत करने का। अगर ऐसे बच्चों की थाली भी सुरक्षित नहीं है, तो फिर कल्याण शब्द का मतलब क्या रह जाता है? पोलवरम की यह घटना कोई अकेला हादसा नहीं है। इससे पहले भी देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी स्कूलों और हॉस्टलों में फूड पॉइजनिंग की खबरें आती रही हैं। हर बार जांच होती है, हर बार कुछ लोग सस्पेंड होते हैं, और फिर सब कुछ धीरे-धीरे भूल दिया जाता है जब तक अगली थाली ज़हर न बन जाए। फिलहाल प्रशासन कह रहा है कि हालात काबू में हैं, बच्चे सुरक्षित हैं और इलाज जारी है। लेकिन असली सवाल अब भी ज़िंदा है क्या सरकारी सिस्टम बच्चों की सेहत को प्राथमिकता देता है, या सिर्फ तब जागता है जब अस्पतालों के बाहर एंबुलेंस लाइन में खड़ी हो जाती हैं?