कहते हैं इतिहास में लड़ाइयाँ सिर्फ तलवारों और मिसाइलों से नहीं जीती जातीं, कई बार युद्ध उन चीज़ों से तय होते हैं जिन पर पूरी सभ्यता टिकी होती है। कभी नमक पर साम्राज्य खड़े हुए, कभी मसालों के लिए समुद्र पार जहाज़ चले और आज की दुनिया में वही भूमिका निभाता है तेल यानी काला सोना, जिस पर आधुनिक अर्थव्यवस्था की सांस चलती है। यही वजह है कि जब मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच तनाव की खबरें आयी तो दुनिया सबसे पहले तेल के नक्शे को देखने लगी क्योंकि यह वही इलाका है जहाँ से दुनिया की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसी पृष्ठभूमि में एक नया सवाल उठने लगा है अगर युद्ध गहरा गया और तेल की सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत जैसे देशों का क्या होगा? दरअसल भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, इसलिए मिडिल ईस्ट में कोई भी उथल-पुथल सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम आदमी की जेब तक पहुँचती है। हाल के दिनों में कई रिपोर्टों में यह दावा सामने आया कि भारत के पास सिर्फ करीब 50 दिनों का तेल स्टॉक है जिसमें लगभग 25 दिन का कच्चा तेल और 25 दिन का रिफाइंड पेट्रोल-डीजल जैसे उत्पाद शामिल हैं। लेकिन जब आधिकारिक आंकड़ों को देखा जाता है तो तस्वीर थोड़ी बड़ी दिखाई देती है। भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 70 से 75 दिनों तक चलने वाला तेल भंडार मौजूद है। इसमें करीब 9 से 10 दिन का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व शामिल है यानी वह आपातकालीन तेल जिसे सरकार युद्ध या वैश्विक संकट की स्थिति में इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रखती है जबकि लगभग 60 से 65 दिनों का तेल स्टॉक रिफाइनरियों और तेल कंपनियों के पास कमर्शियल रूप में मौजूद रहता है। यही वजह है कि अलग-अलग रिपोर्टों में 25 दिन, 50 दिन या 70 दिन जैसे अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहते हैं, क्योंकि हर रिपोर्ट में गिनती का तरीका थोड़ा अलग होता है। असल चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह वही समुद्री रास्ता है जो ईरान के पास स्थित है और जिसके जरिए रोज़ लगभग 15 मिलियन बैरल तेल दुनिया के बाजार तक पहुँचता है। यानी दुनिया की कुल तेल सप्लाई का करीब 20 प्रतिशत इसी संकरे समुद्री रास्ते पर निर्भर है। अगर युद्ध के कारण यह रास्ता बाधित होता है तो सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं बल्कि एशिया, यूरोप और पूरी दुनिया के अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है। भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और आयात पर निर्भरता अभी भी बहुत ज्यादा है। हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इस जोखिम को कम करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया और आज रूस भारत के सबसे बड़े तेल सप्लायरों में से एक बन चुका है। इसके अलावा भारत अमेरिका, ब्राजील, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे कई देशों से भी तेल आयात करके अपने स्रोतों को विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। हालिया खबरों में यह भी सामने आया कि अमेरिका ने भारत को अस्थायी तौर पर रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी है ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार में सप्लाई बनी रहे और कीमतों में अचानक विस्फोट न हो। दूसरी तरफ भारत के पास विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर जैसे स्थानों पर बनाए गए स्ट्रैटेजिक तेल भंडार भी मौजूद हैं, जिन्हें आपातकाल की स्थिति में खोला जा सकता है। सरकार भविष्य में इन भंडारों को और बढ़ाकर लगभग 90 दिनों तक की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की योजना पर भी काम कर रही है, ताकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मानकों के करीब पहुँचा जा सके। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि युद्ध की आंच सबसे पहले तेल के बाजार को छूती है और तेल की कीमतें बढ़ते ही उसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थों और महंगाई तक हर जगह दिखाई देता है। इसलिए मिडिल ईस्ट का यह तनाव सिर्फ एक भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि ऊर्जा की उस शतरंज का हिस्सा है जिसमें हर चाल का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि अगर संकट गहराता भी है तो भारत के पास कुछ हफ्तों से लेकर दो महीने से ज्यादा तक की ऊर्जा सुरक्षा मौजूद है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि तेल की दुनिया में स्थिरता कभी स्थायी नहीं होती और जैसे ही किसी समुद्री रास्ते पर बारूद की गंध फैलती है, दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही बन जाती है कि अगला झटका पेट्रोल पंप तक कब पहुँचेगा।
दुनिया की अर्थव्यवस्था भी अजीब चीज़ है। आम आदमी के घर में अगर कर्ज बढ़ जाए तो चिंता बढ़ जाती है, बैंक के फोन आने लगते हैं और घर की नींद उड़ जाती है। लेकिन इसी दुनिया में एक ऐसा देश भी है जिस पर इतना कर्ज है कि उसका आंकड़ा सुनकर कई देशों की पूरी इकॉनमी छोटी लगने लगे... फिर भी वह देश दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्था बना हुआ है। यह देश है United States। आज अमेरिका पर कुल राष्ट्रीय कर्ज लगभग 34 से 35 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, यानी भारतीय रुपये में गिनें तो यह आंकड़ा करीब 2900 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठता है। इतना कर्ज कि अगर इसे नोटों में छापा जाए तो शायद कई शहर ढक जाएं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इतने बड़े कर्ज के बावजूद न तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था डूब रही है और न ही दुनिया उससे दूरी बना रही है। बल्कि उल्टा, दुनिया के कई देश खुद अमेरिका को पैसा उधार देते हैं। असली वजह समझने के लिए हमें दुनिया की आर्थिक व्यवस्था की उस बुनियादी सच्चाई को समझना होगा जिसे अक्सर डॉलर की ताकत कहा जाता है। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर अभी भी सबसे मजबूत और सबसे भरोसेमंद मुद्रा माना जाता है। दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखे जाते हैं, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा भी डॉलर में ही होता है। इसका मतलब यह हुआ कि जब दुनिया का व्यापार डॉलर में चलता है तो अमेरिका के पास अपनी मुद्रा में कर्ज लेने की अनोखी ताकत भी आ जाती है। दूसरी बड़ी वजह अमेरिका का विशाल निवेश बाजार है। दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजार वहीं स्थित हैं जैसे S&P 500 और NASDAQ Composite जहाँ दुनिया भर के निवेशक अपना पैसा लगाते हैं। इसके अलावा दुनिया की कई सबसे प्रभावशाली कंपनियाँ भी अमेरिका में ही पैदा हुईं, जैसे Apple, Microsoft, Amazon और Nvidia। इन कंपनियों की बाजार कीमत इतनी बड़ी है कि कई देशों की पूरी इकॉनमी भी उनके सामने छोटी लग सकती है। यही कंपनियाँ टैक्स, नौकरियाँ और तकनीकी ताकत के जरिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लगातार मजबूत बनाए रखती हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका जब कर्ज लेता है तो वह आम लोगों की तरह बैंक से लोन नहीं लेता, बल्कि सरकारी बॉन्ड जारी करता है जिन्हें पूरी दुनिया खरीदती है। इनमें सबसे बड़े खरीदारों में Japan और China जैसे देश शामिल हैं। कारण सीधा है अमेरिकी सरकारी बॉन्ड को दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। इसलिए कई देशों के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा इन्हीं बॉन्ड में रखते हैं। यानी एक तरह से दुनिया के कई देश अमेरिका को पैसा उधार देते हैं ताकि उनका पैसा सुरक्षित रहे। फिर भी सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका इतना कर्ज लेता क्यों है। इसका कारण सरकार का विशाल खर्च है सेना, हेल्थकेयर, सोशल सिक्योरिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर और वैज्ञानिक रिसर्च जैसे क्षेत्रों पर अमेरिका हर साल भारी पैसा खर्च करता है। जब सरकारी खर्च टैक्स से मिलने वाली आय से ज्यादा हो जाता है तो बजट घाटा बढ़ता है और वही धीरे-धीरे राष्ट्रीय कर्ज में बदल जाता है। लेकिन अमेरिका की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी और गतिशील है कि यह कर्ज फिलहाल उसके लिए घातक साबित नहीं होता। आज अमेरिका की इकॉनमी का आकार लगभग 28 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है, यानी कर्ज बहुत बड़ा जरूर है, लेकिन उसे संभालने वाली अर्थव्यवस्था भी उतनी ही विशाल है। असल में अमेरिका की ताकत सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था में नहीं बल्कि उसके प्रभाव में भी छिपी है दुनिया का सबसे बड़ा वित्तीय बाजार, सबसे प्रभावशाली टेक कंपनियाँ, मजबूत संस्थाएँ और डॉलर की वैश्विक भूमिका उसे एक अलग तरह की आर्थिक सुरक्षा देती है। लेकिन इसके बावजूद एक सवाल हमेशा बना रहता है अगर कभी दुनिया का भरोसा डॉलर से डगमगा गया तो क्या होगा? कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक कहानी शायद यही हो सकती है कि क्या दुनिया हमेशा डॉलर पर भरोसा करती रहेगी
दुनिया रोज़ लगभग 10 करोड़ बैरल तेल जला रही है। यानी हर दिन धरती के अंदर लाखों साल में बने ऊर्जा भंडार को हम कुछ घंटों में खत्म कर देते हैं। इसलिए समय-समय पर एक बड़ा सवाल उठता रहता है क्या एक दिन ऐसा आएगा जब दुनिया का तेल खत्म हो जाएगा? वैज्ञानिकों और ऊर्जा एजेंसियों के मुताबिक अभी दुनिया में लगभग 1.7 ट्रिलियन बैरल के आसपास प्रमाणित तेल भंडार मौजूद हैं। अगर आज की खपत इसी गति से चलती रही तो ये भंडार लगभग 40 से 50 साल तक चल सकते हैं। लेकिन यह अनुमान पूरी तरह स्थिर नहीं है, क्योंकि हर साल नई तकनीक के जरिए नए तेल भंडार खोजे जाते हैं। समुद्र की गहराइयों, आर्कटिक क्षेत्रों और मुश्किल भूभागों में भी तेल की खोज लगातार हो रही है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका में शेल ऑयल तकनीक आने के बाद अचानक दुनिया के तेल भंडार का अनुमान काफी बढ़ गया था। यानी पहले जो तेल निकालना असंभव माना जाता था, तकनीक ने उसे संभव बना दिया। इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि तेल के पूरी तरह खत्म होने से पहले दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था ही बदल सकती है। आज इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से बढ़ रहे हैं, सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग बढ़ रहा है और कई देश 2050 तक कार्बन उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य तय कर चुके हैं। इसलिए भविष्य की सबसे दिलचस्प संभावना यह है कि शायद तेल खत्म होने से पहले ही उसकी मांग कम हो जाए। यानी दुनिया उस दौर में पहुंच सकती है जहाँ धरती के नीचे तेल मौजूद होगा, लेकिन उसे निकालने की जरूरत पहले जैसी नहीं रहेगी। फिलहाल हकीकत यह है कि तेल अभी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। विमानन, ट्रांसपोर्ट, प्लास्टिक उद्योग, रसायन और कई बड़े औद्योगिक सेक्टर अभी भी इसके बिना नहीं चल सकते। इसलिए आने वाले दशकों में तेल की भूमिका खत्म होने वाली नहीं है। लेकिन ऊर्जा की दुनिया धीरे-धीरे बदल जरूर रही है, और शायद आने वाली पीढ़ियाँ उस दौर को देखें जब मानव सभ्यता तेल के बाद की ऊर्जा पर चल रही होगी।