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Breaking News 6 January 2026

1 )  हिंदी के ट्रेंड सेटलर ...सौरभ द्विवेदी की लल्लनटॉप से विदाई .... 

हिंदी को आधुनिक समय में आत्मविश्वास देने वालों में सौरभ द्विवेदी का नाम बहुत ऊपर आता है। उन्होंने हिंदी को न तो किताबों की अलमारी में बंद किया, न ही टीवी स्टूडियो की बनावटी भाषा में कैद रहने दिया। उन्होंने हिंदी को living language बनाया ऐसी भाषा जिसमें सवाल भी थे, झिझक भी, तर्क भी और आम आदमी की धड़कन भी। यही वजह है कि जब सौरभ द्विवेदी ने यह कहा कि “यह मेरी आख़िरी video है, लल्लनटॉप से मेरा रिश्ता यहीं खत्म होता है”, तो यह वाक्य सिर्फ़ एक संस्थान से विदाई नहीं लगा, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के एक पूरे दौर के रुक जाने जैसा महसूस हुआ। सौरभ द्विवेदी का लल्लनटॉप से जाना अचानक नहीं था, लेकिन जिस तरह से यह सामने आया, उसने लाखों लोगों को असहज कर दिया। उनके आख़िरी वीडियो के बाद लल्लनटॉप की टीम के सदस्यों ने सोशल मीडिया पर इमोशनल पोस्ट साझा किए कहीं तस्वीरें थीं, कहीं पुराने वीडियो, कहीं सिर्फ़ एक लाइन: “Thank you for everything.” यह साफ़ संकेत था कि यह कोई टकराव या हंगामे भरा exit नहीं, बल्कि एक planned editorial transition है। फिर भी, सवाल उठना स्वाभाविक था आख़िर ऐसा क्या हुआ कि हिंदी पत्रकारिता का सबसे पहचाना चेहरा अपने ही बनाए मंच से अलग हो गया? इस पूरी चर्चा के बीच एक बड़ा भ्रम बार-बार उभरा कि लल्लनटॉप के मालिक सौरभ द्विवेदी ही हैं, फिर वे उसे छोड़ कैसे सकते हैं। सच्चाई इससे अलग है। लल्लनटॉप एक डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जिसका संस्थागत ढांचा कॉरपोरेट है। सौरभ द्विवेदी इसके founder-editor और वैचारिक architect रहे उन्होंने इसकी भाषा, इसका tone और इसका journalism model तय किया, लेकिन ownership उनके पास नहीं थी। यही फर्क न समझ पाने की वजह से सोशल मीडिया पर तरह-तरह की कहानियाँ बनने लगीं। इन कहानियों में सबसे ज़्यादा चर्चा इंदौर से जुड़ी एक रिपोर्ट को लेकर हुई। लल्लनटॉप पर आई उस रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही, public health crisis और सिस्टम की चुप्पी पर तीखे सवाल थे। इसके बाद अचानक उनके विदाई वीडियो ने लोगों को जोड़-घटाव करने पर मजबूर कर दिया। क्या यह किसी दबाव का नतीजा था? क्या सवाल पूछने की कीमत चुकानी पड़ी? इन सवालों का जवाब किसी आधिकारिक बयान में नहीं मिला। इसलिए सच यही है कि यह speculation है हकीकत नहीं। लेकिन डिजिटल युग में timing ही narrative बन जाती है, और वही यहाँ हुआ। सौरभ द्विवेदी को समझने के लिए सिर्फ़ उनके जाने की वजह देखना काफ़ी नहीं है, उनकी यात्रा देखनी ज़रूरी है। उन्होंने पारंपरिक न्यूज़रूम से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता में वह प्रयोग किया, जिसकी हिंदी मीडिया को लंबे समय से ज़रूरत थी। उन्होंने इंटरव्यू को interrogation नहीं, conversation बनाया। उन्होंने खबर को शोर नहीं, context दिया। यही कारण है कि उनके कार्यक्रमों में नेता, लेखक, अभिनेता या आम लोग सब असहज होने के बावजूद खुलकर बोलते थे। यह skill किताबों से नहीं आती, यह भाषा और संवेदना की गहरी समझ से आती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि सौरभ द्विवेदी का झुकाव सिर्फ़ खबर तक सीमित नहीं रहा। हिंदी साहित्य, कविता और विचार परंपरा से उनका रिश्ता हमेशा जीवित रहा। यही वजह है कि उनकी हिंदी न तो नारेबाज़ी करती थी, न ही भारी-भरकम शब्दों का बोझ ढोती थी। उनकी भाषा में कबीर भी झलकता था और आधुनिक newsroom की clarity भी। उन्होंने यह साबित किया कि हिंदी में intellectual seriousness संभव है, बिना अंग्रेज़ी के सहारे। लोकप्रियता के साथ विवाद भी आए। कभी उनके किसी मंच पर बैठे होने को लेकर सवाल उठे, कभी पुराने बयानों को निकालकर उन्हें किसी विचारधारा से जोड़ने की कोशिश की गई। सोशल मीडिया ने उन्हें भी नहीं बख़्शा। लेकिन इन सभी विवादों के बीच एक बात स्थिर रही उनकी पत्रकारिता की मूल आत्मा। उन्होंने न तो खुद को संत की तरह पेश किया, न ही प्रचारक की तरह। वे सवाल पूछते रहे, और शायद यही सबसे बड़ी असुविधा थी। अब सवाल यह है कि वे आगे क्या करेंगे। इसका जवाब अभी उनके पास भी सार्वजनिक रूप से नहीं है। लेकिन इतना तय है कि सौरभ द्विवेदी जैसे लोग पत्रकारिता छोड़ते नहीं, सिर्फ़ उसका रूप बदलते हैं। संभव है कि वे स्वतंत्र मंच पर लौटें, संभव है कि वे long-form बातचीत और विचारप्रधान content पर और गहराई से काम करें। जो भी हो, उनका अगला अध्याय उसी हिंदी में लिखा जाएगा, जिसे उन्होंने बोलना नहीं सोचना सिखाया। सौरभ द्विवेदी ने हिंदी पत्रकारिता में वही खाली जगह छोड़ी है ऐसी जगह जिसे भरने के लिए सिर्फ़ नया चेहरा नहीं, नई संवेदना चाहिए।