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Breaking News 6 February 2026

1 ) Why Loneliness Is Rising Fast

आज के समय में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके हाथ में मोबाइल न हो। काम, पढ़ाई, एंटरटेनमेंट, दोस्ती सब कुछ मोबाइल के ज़रिए हो रहा है। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक समस्या भी तेज़ी से बढ़ी है, और वो है अकेलापन और मानसिक तनाव। यह कोई सोच-विचार या फिलॉसफी की बात नहीं है, बल्कि रिसर्च और डेटा से जुड़ा हुआ एक साफ़ ट्रेंड है। World Health Organization के मुताबिक, आज दुनिया में हर 6 में से 1 व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करता है। WHO यह भी मानता है कि loneliness अब सिर्फ़ इमोशनल इश्यू नहीं रहा, बल्कि एक health risk बन चुका है। लंबे समय तक अकेलापन डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की दिक्कत और दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे को बढ़ा देता है। अनुमान है कि इससे जुड़ी समस्याओं के कारण हर साल लाखों लोगों की जान जा रही है। अगर सीधे शब्दों में समझें, तो दिक्कत मोबाइल से नहीं है, दिक्कत मोबाइल के इस्तेमाल के तरीके से है। आज ज़्यादातर लोग फोन पर बात कम करते हैं और स्क्रॉल ज़्यादा। सोशल मीडिया पर घंटों बिताने के बावजूद real बातचीत नहीं होती। इंसान लोगों को देख रहा होता है, लेकिन उनसे जुड़ नहीं पा रहा होता। यही gap धीरे-धीरे loneliness में बदल जाता है। COVID के बाद यह समस्या और साफ़ दिखने लगी। बहुत से लोग पुराने social routine में वापस नहीं लौट पाए। बाहर जाना, लोगों से मिलना, बातचीत करना ये सब चीज़ें effort लगने लगीं। भारत में भले ही loneliness पर कोई बड़ा national survey न हो, लेकिन कॉलेज स्टूडेंट्स और युवा प्रोफेशनल्स पर हुई स्टडीज़ एक ही बात कहती हैं  अकेलापन बढ़ रहा है। खासकर मेडिकल और प्रोफेशनल कोर्स करने वाले छात्रों में बड़ी संख्या में लोग mental stress और loneliness की शिकायत कर रहे हैं। यह वही उम्र है जहाँ लोग सबसे ज़्यादा social होने चाहिए, लेकिन दबाव और competition उन्हें उल्टा अकेला बना रहा है।

 यह मुद्दा सिर्फ़ mental health तक सीमित नहीं है, बल्कि काम और productivity से भी जुड़ा है। जो लोग अंदर से तनाव में रहते हैं, उनका फोकस कमजोर होता है, काम में मन नहीं लगता, और burnout जल्दी होता है। कंपनियों के लिए भी यह नुकसान का सौदा है, क्योंकि mental stress सीधे performance और efficiency को प्रभावित करता है। वैज्ञानिक तौर पर भी loneliness का असर साफ़ है। जब इंसान लंबे समय तक अकेला रहता है, तो शरीर लगातार stress mode में रहता है। इससे नींद खराब होती है, इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ता है और mood balance बिगड़ता है। यही वजह है कि loneliness को अब serious health factor माना जा रहा है। इस पूरी समस्या के पीछे कुछ साफ़ कारण हैं ज़्यादा स्क्रीन-टाइम, कम real interaction, शहरों में अकेली ज़िंदगी, nuclear families, job pressure, और mental health पर खुलकर बात न करना। ये सारे factors मिलकर loneliness को एक silent problem बना रहे हैं, जो दिखती नहीं लेकिन असर गहरा करती है। समाधान भी बहुत complex नहीं हैं। Experts मानते हैं कि structured social interaction, workplace में mental health support, educational institutions में counselling और screen-use awareness से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मतलब साफ़ है सिस्टम को इंसान-friendly बनाना होगा। Bottom line ये है कि mobile addiction और loneliness कोई individual failure नहीं है।
यह एक modern lifestyle problem है, जो health, productivity और society तीनों को affect कर रही है। अगर इसे अभी serious नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में mental health crisis और बड़ा हो सकता है।