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Breaking News 5 January 2026

1 )  उमर खालिद-शरजील इमाम को जमानत से सुप्रीम कोर्ट का इनकार 

सवाल आज भी वही है क्या हर Protest लोकतंत्र की आवाज़ होता है, या फिर कभी-कभी वही विरोध National Security के लिए चुनौती बन जाता है? यही मूल प्रश्न 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े उस मामले के केंद्र में है, जिसमें Umar Khalid और Sharjeel Imam को जमानत देने से Supreme Court of India ने इनकार कर दिया, जबकि इसी केस में शामिल पाँच अन्य आरोपियों को बेल मिल गई।
यह मामला 2020 में हुए उन दंगों से जुड़ा है, जिनमें 50 से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए। दिल्ली पुलिस की जांच के अनुसार यह हिंसा कोई spontaneous riot नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक larger conspiracy थी, जिसे CAA–NRC Protest की आड़ में अंजाम दिया गया। पुलिस का दावा है कि विरोध को योजनाबद्ध तरीके से Road Blockade Chakka Jam, Incendiary Speeches, और Organised Mobilisation में बदला गया, ताकि Public Order को ध्वस्त किया जा सके।
उमर खालिद, जो JNU के पूर्व छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता रहे हैं, पर आरोप है कि उन्होंने दंगों से पहले ऐसे भाषण दिए जो provocative थे और जिनका उद्देश्य विरोध को हिंसक मोड़ देना था। अभियोजन के अनुसार, उनके भाषण, डिजिटल चैट्स, कॉल डिटेल्स और घटनाओं की टाइमलाइन यह संकेत देती है कि वे विरोध के नेटवर्क को coordinate कर रहे थे। वहीं शरजील इमाम की पहचान CAA–NRC आंदोलन के दौरान दिए गए उनके विवादित बयानों से जुड़ी है, जिनमें देश की भौगोलिक संरचना को लेकर दिए गए बयान भी शामिल हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि ये बयान सिर्फ dissent नहीं थे, बल्कि उनका संभावित प्रभाव public disorder और secessionist narrative को बढ़ावा देने वाला था। इन्हीं आरोपों के आधार पर दोनों पर Unlawful Activities Prevention Act के तहत केस दर्ज किया गया। UAPA की धारा 43D(5) के अनुसार, यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि आरोप prima facie true हैं, तो जमानत देना बेहद कठिन हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस स्तर पर सबूतों की गहराई में जाकर यह तय करना कि आरोपी दोषी हैं या नहीं, उचित नहीं है क्योंकि मामला अभी Trial Stage में है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जमानत से इनकार का अर्थ यह नहीं है कि आरोप सिद्ध हो चुके हैं, बल्कि केवल यह कि मौजूदा कानूनी मानकों के तहत बेल नहीं दी जा सकती। इसी केस में पाँच अन्य सह-आरोपियों को जमानत दिए जाने पर भी सवाल उठे, लेकिन कोर्ट ने यहां Role-Based Differentiation का सिद्धांत अपनाया। अदालत के अनुसार उन आरोपियों की भूमिका सीमित थी, उनका सीधे तौर पर हिंसा या कथित साजिश से मजबूत लिंक नहीं दिखा और वे लंबे समय से Judicial Custody में थे। इसी आधार पर उन्हें बेल दी गई, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में आरोपों की प्रकृति और सामग्री अधिक गंभीर मानी गई।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर Free Speech vs State Security की बहस को तेज कर दिया है। बचाव पक्ष का तर्क है कि यह मामला Freedom of Expression को कुचलने का प्रयास है, जबकि अभियोजन और अदालत का रुख यह है कि हर भाषण protected speech नहीं होता, खासकर तब जब उसका संभावित असर हिंसा, अराजकता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़े। सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अहम है, लेकिन जब विरोध की सीमाएं टूटकर सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने लगें, तो राज्य का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। फिलहाल यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और इसका अंतिम निष्कर्ष ट्रायल पूरा होने के बाद ही सामने आएगा। तब तक सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल जमानत से जुड़ा फैसला है, न कि दोष या निर्दोष का अंतिम प्रमाण। लेकिन इतना तय है कि यह केस आने वाले समय में भारत के Protest Jurisprudence, UAPA Interpretation और Civil Liberties पर गहरी छाप छोड़ने वाला है

 

2 )  गोवा में आम आदमी पार्टी ध्वस्त: बड़े चेहरों का इस्तीफा 

गोवा की राजनीति में आम आदमी पार्टी के लिए हालिया घटनाक्रम किसी बड़े organizational setback से कम नहीं हैं। सवाल यह है कि जो पार्टी कभी गोवा में खुद को एक मजबूत alternative political force के तौर पर पेश कर रही थी, वह अचानक भीतर से इतनी कमजोर क्यों दिखने लगी? जवाब हाल के दिनों में हुए इस्तीफों, पद से हटाए जाने और चुनावी नाकामी की कड़ियों में छिपा है, जिसने AAP गोवा यूनिट को गंभीर leadership crisis में डाल दिया है। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब Aam Aadmi Party के गोवा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष Amit Palekar को पद से हटा दिया गया। पार्टी ने यह कदम ज़िला परिषद चुनावों में बेहद खराब प्रदर्शन के बाद उठाया। AAP ने 40 में से केवल 1 सीट जीती, जिसे पार्टी नेतृत्व ने साफ तौर पर electoral failure माना। इसके बाद संगठन को संभालने के लिए अंतरिम रूप से Shri Krishna Parab को जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन इससे अंदरूनी असंतोष कम नहीं हुआ। इसी बीच पार्टी को एक और झटका तब लगा जब AAP गोवा के उपाध्यक्ष Ramrao Wagh ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और पद दोनों से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा जिला पंचायत चुनावों से ठीक पहले आया, जिससे यह संकेत मिला कि पार्टी के भीतर grassroot-level dissatisfaction गहराता जा रहा है। रामराव वाघ का जाना इसलिए भी अहम माना गया क्योंकि वे संगठनात्मक स्तर पर एक सक्रिय चेहरा थे और उनका बाहर जाना AAP के लिए structural weakness को उजागर करता है। संकट यहीं नहीं रुका। AAP गोवा के कार्यकारी अध्यक्ष Rajesh Kalangutkar ने भी पार्टी से अलग होने का ऐलान कर दिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, खासकर Arvind Kejriwal के विपक्षी दलों के साथ गठबंधन न करने के फैसले से वे असहमत थे। कलंगुटकर के अनुसार, गोवा जैसे राज्य में जहां राजनीति coalition dynamics पर चलती है, वहां अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। उनका इस्तीफा इस बात का संकेत बना कि AAP के भीतर strategic disagreement अब खुलकर सामने आ चुका है।
इन तमाम घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ होती है गोवा में AAP सिर्फ चुनाव नहीं हार रही, बल्कि भरोसा भी खो रही है। प्रदेश अध्यक्ष का हटना, उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष जैसे वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना, और लगातार खराब चुनावी प्रदर्शन, यह सब मिलकर पार्टी को एक गहरे credibility crisis में धकेल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर AAP गोवा में जल्द ही संगठनात्मक पुनर्गठन, स्थानीय नेतृत्व को महत्व और ज़मीनी राजनीति के मुताबिक रणनीति नहीं बनाती, तो आने वाले समय में उसका अस्तित्व और कमजोर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, गोवा में आम आदमी पार्टी के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है क्या वह इस अंदरूनी टूट और असंतोष से उबरकर खुद को फिर से खड़ा कर पाएगी, या यह संकट उसके राज्य में सिमटते राजनीतिक भविष्य की कहानी बन जाएगा?