इंटरनेट इस वक्त किसी बॉक्स ऑफिस क्लैश से कम नहीं दिख रहा। एक तरफ धुरंधर 2, दूसरी तरफ Toxic और बीच में फैंस, थ्योरी और वो शोर जो अक्सर हकीकत से पहले पैदा हो जाता है। दिलचस्प बात ये है कि इस पूरे घमासान में अभी तक न तो किसी फिल्म के पोस्टपोन होने की ऑफिशियल खबर है, न ही क्लैश की पक्की तारीख, लेकिन सोशल मीडिया पहले ही फैसला सुना चुका है। सवाल बस ये नहीं है कि कौन ज़्यादा कमाएगा, सवाल ये है कि किसकी ज़रूरत किसे ज़्यादा है क्लैश की या सोलो रन की। KGF के बाद Yash किसी आम स्टार की तरह अगली फिल्म नहीं कर रहे। Toxic उनके लिए सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उनकी स्टारडम की अगली परिभाषा मानी जा रही है। यही वजह है कि फैंस इसे event film की तरह ट्रीट कर रहे हैं ऐसी फिल्म जो रिलीज़ के दिन से पहले ही माहौल बना दे। इंटरनेट पर चल रही थ्योरी कहती है कि Toxic को किसी भी हाल में क्लैश से दूर रखा जाएगा, क्योंकि KGF के बाद यश की पहली बड़ी पेशकश को मेकर्स आधा ध्यान बाँटकर रिलीज़ नहीं करना चाहेंगे। फैंस का भरोसा यहां सिर्फ स्टार पर नहीं, बल्कि उस ब्रांड पर है जो KGF ने बनाया। दूसरी तरफ, धुरंधर 2 अपने साथ सीक्वल का बोझ लेकर चल रही है। सीक्वल हमेशा दोधारी तलवार होता है एक तरफ पहले पार्ट की बनी-बनाई ऑडियंस, दूसरी तरफ उसी ऑडियंस की बढ़ी हुई उम्मीदें। इंटरनेट पर यही सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है कि क्या धुरंधर 2 पहले पार्ट की ताज़गी और असर को दोहरा पाएगी, या फिर ये भी उन फिल्मों की लिस्ट में जुड़ जाएगी जो ठीक थी, लेकिन पार्ट-1 जैसी बात नहीं रही कहकर भुला दी जाती हैं। यही अनिश्चितता इसे क्लैश की स्थिति में थोड़ा कमजोर बनाती है कम से कम फैन थ्योरी की नजर में। अगर पिछले इतिहास को देखें, तो पैटर्न बहुत साफ दिखता है। KGF 2 के समय कई फिल्मों ने बिना शोर मचाए अपनी रिलीज़ डेट बदली थी। वजह सिर्फ डर नहीं थी, बल्कि गणित था स्क्रीन काउंट, शो टाइमिंग और ओपनिंग डे का क्रेज़। भारत में अक्सर देखा गया है कि मेगा-स्टार की सोलो फिल्म को थिएटर मालिक प्राथमिकता देते हैं, खासकर तब जब फिल्म पहले ही इवेंट की तरह प्रोजेक्ट की जा रही हो। इस समीकरण में सीक्वल अक्सर खुद को एडजस्ट करता है, चाहे उसका कंटेंट कितना भी मजबूत क्यों न हो। अब बात आती है सबसे ज्यादा पूछे जा रहे सवाल की अगर क्लैश हुआ तो कौन जीतेगा? थ्योरी बेस्ड एनालिसिस कहता है कि ओपनिंग डे और पहले वीकेंड पर Toxic को बढ़त मिलेगी। सिंगल स्क्रीन और मास बेल्ट में यश की फिल्म का पलड़ा भारी रहने की पूरी संभावना है। धुरंधर 2 के लिए असली परीक्षा इसके बाद शुरू होगी अगर कंटेंट दमदार निकला, तो ये धीरे-धीरे अपनी जगह बना सकती है, लेकिन शुरुआती शोर में दबने का रिस्क रहेगा। पोस्टपोनमेंट की बात करें तो इंटरनेट का अनुमान लगभग एकतरफा है। माना जा रहा है कि अगर किसी एक फिल्म को तारीख बदलनी पड़ी, तो वो धुरंधर 2 होगी। वजह सीधी है Toxic को यश की करियर डिफाइनिंग फिल्म माना जा रहा है, जिसकी मार्केटिंग, इंटरनेशनल अपील और ब्रांड वैल्यू पहले से तय दिशा में जा रही है। ऐसी फिल्में आखिरी वक्त पर दिशा नहीं बदलतीं, जब तक कोई बहुत बड़ी मजबूरी न हो। लेकिन इस पूरे शोर के बीच एक सच्चाई है, जिसे शायद जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। अभी तक जो कुछ भी चल रहा है, वो ऑफिशियल नहीं, बल्कि फैन माइंडसेट और सोशल मीडिया नैरेटिव है। न किसी प्रोडक्शन हाउस का बयान आया है, न किसी स्टार ने क्लैश या पोस्टपोनमेंट पर मुहर लगाई है। यानी असली लड़ाई थिएटर में नहीं, बल्कि X और यूट्यूब थंबनेल में लड़ी जा रही है।
दुनिया में जब भी पैसा कांपता है, युद्ध की आहट आती है या बाज़ार अचानक सांस रोक लेता है, तो एक नाम बिना बुलाए सामने आ जाता है United States of America। यह वो देश है जिसकी आबादी दुनिया का सिर्फ चार प्रतिशत है, लेकिन असर ऐसा कि बाकी छियानवे प्रतिशत उसी के फैसलों से हिलते-डुलते हैं। अमेरिका न सबसे बड़ा देश है, न सबसे ज्यादा आबादी वाला, फिर भी पूरी दुनिया के सिस्टम की चाबी उसी की जेब में दिखती है। कहीं डॉलर छपता है और कहीं मेहनत की कीमत बदल जाती है, कहीं पेंटागन का बजट बढ़ता है और कहीं बाजार डर के मारे गिर जाता है। यही से यह कहानी शुरू होती है एक ऐसे देश की कहानी जो नक्शे पर एक राष्ट्र है, लेकिन हकीकत में पूरी दुनिया के लिए एक चलता-फिरता ऑपरेटिंग सिस्टम बन चुका है अमेरिका की कहानी जमीन से शुरू नहीं होती, भरोसे से शुरू होती है। 8000 मेट्रिक टन से ज्यादा सोना सिर्फ vault में बंद धातु नहीं है, वह दुनिया के लिए एक मैसेज है अगर सब कुछ गिर भी जाए, तो हमारे पास खड़े रहने की वजह है। Gold यहां wealth नहीं, psychology है। जब डर फैलता है, तब दुनिया अमेरिका को safe bet मानती है, और यही भरोसा उसकी economy की पहली ईंट बनता है।
फिर आता है डॉलर एक ऐसा कागज जिसने पूरी दुनिया को अपनी भाषा सिखा दी। Dollar कोई normal currency नहीं है, यह global entry pass है। तेल चाहिए, हथियार चाहिए, trade करना है, reserve बनाना है डॉलर चाहिए। अमेरिका नोट छापता है और दुनिया sweat करती है। यह unfair लगता है, लेकिन यही आज का सिस्टम है। Dollar चलता है क्योंकि दुनिया उसे चलने देती है, और दुनिया उसे चलने देती है क्योंकि उसके पास कोई दूसरा stable ऑप्शन नहीं है। अमेरिका की military को लोग ताकत समझते हैं, लेकिन असल में वह डर की मैनेजमेंट मशीन है। करीब एक ट्रिलियन डॉलर का defense budget युद्ध जीतने के लिए नहीं, युद्ध रोकने के लिए है। 700 से ज्यादा military bases दुनिया भर में फैले हैं यह गोलियां नहीं, signals हैं। Signal यह कि अमेरिका चाहे तो पहुंच सकता है। और यही signal markets को stable रखता है, investors को भरोसा देता है, और allies को security का एहसास कराता है। इस सिस्टम को चलाने में सिर्फ सरकार नहीं, लोग भी हिस्सेदार हैं। अमेरिका में 24 मिलियन से ज्यादा millionaires हैं। यह अमीरी दिखावे के लिए नहीं, flow के लिए है। पैसा यहां रुकता नहीं, घूमता है stocks में, startups में, real estate में, नए ideas में। यही circulation economy को जिंदा रखता है। यहां wealth एक trophy नहीं, एक tool है। Wall Street सिर्फ एक जगह नहीं, यह दुनिया की नस है। Global stock market value का लगभग आधा हिस्सा अमेरिका में सांस लेता है। Apple, Google, Microsoft, Amazon जैसी कंपनियां सिर्फ products नहीं बेचतीं, ये आदतें बनाती हैं। ये तय करती हैं कि लोग क्या देखेंगे, कैसे सोचेंगे, और कल कैसा होगा। जब Wall Street हिलता है, तो एशिया से लेकर यूरोप तक markets को चक्कर आ जाता है। अमेरिका का असली export raw material नहीं है, future है। Artificial Intelligence, space technology, software, pharma patents ये सब अमेरिका बनाता है और दुनिया इस्तेमाल करती है। Ownership अमेरिका के पास रहती है, consumption दुनिया करती है। जो देश future बेचता है, उसे present की चिंता नहीं करनी पड़ती। Education और immigration अमेरिका की सबसे silent लेकिन sharp strategy है। दुनिया के सबसे तेज दिमाग अमेरिका पहुंचते हैं कोई student बनकर, कोई researcher बनकर, कोई worker बनकर। System उन्हें मौका देता है, resources देता है, और धीरे-धीरे उन्हें अपने इंजन का हिस्सा बना लेता है। दिमाग बाहर से आता है, लेकिन power अमेरिका के नाम हो जाती है। Financial institutions पर अमेरिका का असर सीधा नहीं दिखता, लेकिन गहरा है। IMF, World Bank, global banking system सब कहीं न कहीं dollar से जुड़े हैं। अगर अमेरिका चाहे, तो किसी देश की economy को गोली चलाए बिना भी घुटनों पर ला सकता है। Sanctions आज की दुनिया के silent weapons हैं आवाज़ नहीं करते, लेकिन असर पूरा करते हैं। और फिर आती है soft power सबसे खतरनाक, सबसे अनदेखी ताकत। Hollywood, Netflix, social media, English language अमेरिका दुनिया को सिर्फ rule नहीं करता, वह दुनिया को सोचने का तरीका देता है। धीरे-धीरे वही lifestyle normal लगने लगता है, वही dreams standard बन जाते हैं। यह power दिखाई नहीं देती, लेकिन पीढ़ियों पर असर छोड़ जाती है। यह भी सच है कि अमेरिका पर कर्ज है, inequality है, political chaos है, और China जैसे challengers सामने हैं। लेकिन फर्क यह है कि अमेरिका की कमजोरी भी global होती है, और उसकी recovery भी। उसका system गिरता नहीं, adjust करता है। सच्चाई बहुत simple है अमेरिका सबसे ताकतवर इसलिए नहीं है क्योंकि उसके पास सबसे ज्यादा पैसा है, बल्कि इसलिए क्योंकि उसका पैसा, उसकी military, उसकी technology, उसका media और उसका डर सब एक ही direction में चलते हैं। अमेरिका एक देश नहीं, एक operating system है। और सवाल यह नहीं कि यह system गिरेगा या नहीं। सवाल यह है कि अगर यह system कभी लड़खड़ाया, तो दुनिया कितनी देर balance बना पाएगी।
एपस्टीन फाइल्स हाँ, वही मामला… लेकिन एक बार और नए रिलीज के साथ....बहुत-से लोगों को लगेगा कि यह कोई पुरानी बात है। आखिर दिसंबर में भी तो एपस्टीन फाइल्स सामने आई थीं। लेकिन यहीं सबसे बड़ा भ्रम है। सच यह है कि जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी फाइलें एक बार फिर दोबारा रिलीज़ की गई हैं, और वजह सिर्फ़ सुर्खियाँ नहीं, बल्कि कानून और दबाव है। अमेरिका में पारदर्शिता से जुड़े नए नियमों के तहत सरकार को मजबूरन वे दस्तावेज़ सार्वजनिक करने पड़े, जो पहले या तो अधूरे थे या छिपे हुए। इसलिए यह पुराना केस नहीं, बल्कि पुराने केस की नई परत है। इस बार जारी की गई सामग्री को अमेरिका के United States Department of Justice ने सार्वजनिक किया है। इसमें ईमेल ड्राफ्ट, नोट्स, तस्वीरें और निजी रिकॉर्ड शामिल हैं। हालांकि ज़्यादातर हिस्से काट-छांट किए गए हैं, ताकि पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रहे। सरकार का दावा है कि यह रिलीज़ किसी लीक या साजिश का नतीजा नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता है। इन दस्तावेज़ों में कुछ बड़े नामों का ज़िक्र फिर से सामने आया है, जिनमें Jeffrey Epstein के निजी नोट्स और संपर्कों का उल्लेख है। सबसे ज़्यादा चर्चा Bill Gates से जुड़े कथित दावों को लेकर हो रही है। लेकिन यहां साफ़ रेखा खींचना ज़रूरी है ये बातें सरकारी आरोप नहीं, बल्कि एपस्टीन के निजी ड्राफ्ट्स में लिखे गए असत्यापित दावे हैं, जिनकी कोई न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है। असल मुद्दा नामों से ज़्यादा सिस्टम का है। एपस्टीन का नेटवर्क, उसकी पहुंच और उसकी मौत इन सबने अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। दिसंबर की रिलीज़ अधूरी थी, इसलिए अब दोबारा फाइलें सामने लाई गईं। यह रिलीज़ बताती है कि सच एक साथ नहीं आता, वह क़दम-क़दम पर, दबाव के साथ बाहर निकाला जाता है।