क्या 21वीं सदी में, जब ड्रोन, मिसाइल और satellite warfare की बात होती है, दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के सैनिक पत्थरों, लोहे की रॉड और कीलों वाले डंडों से लड़ सकते हैं? क्या कोई आधुनिक सैन्य संघर्ष ऐसा हो सकता है जिसमें एक भी गोली न चले, लेकिन दर्जनों सैनिक शहीद हो जाएँ? 15 जून 2020 की रात, पूर्वी लद्दाख की Galwan Valley में जो हुआ, उसने इन सभी सवालों को एक भयावह हकीकत में बदल दिया।
गलवान घाटी केवल एक पहाड़ी इलाका नहीं है, बल्कि यह भारत-चीन सीमा पर स्थित एक strategic pressure point है। यह क्षेत्र LAC के बेहद करीब है और Darbuk–Shyok–Daulat Beg Oldie Road के पास स्थित है। यह सड़क भारत के लिए एक critical military logistics corridor है, जो Daulat Beg Oldie जैसे high-altitude airstrip को सप्लाई देता है। चीन लंबे समय से इस रोड को भारत की strategic advantage के रूप में देखता रहा है, क्योंकि इससे भारतीय सेना की troop movement, surveillance और rapid deployment capability कई गुना बढ़ जाती है। मई 2020 से ही पूर्वी लद्दाख में हालात सामान्य नहीं थे। People’s Liberation Army ने कई इलाकों में forward deployment, टेंट, observation posts और अस्थायी ढांचे खड़े करने शुरू कर दिए। यह सब उस status quo के खिलाफ था जो दशकों से चला आ रहा था। भारत ने इसे unilateral attempt to change ground position माना। इसके बाद दोनों देशों के बीच flag meetings, corps commander-level talks और diplomatic engagement शुरू हुई। 6 जून 2020 को एक महत्वपूर्ण military agreement हुआ, जिसमें तय किया गया कि दोनों पक्ष disengagement करेंगे और विवादित इलाकों से पीछे हटेंगे। अस्थायी ढांचे हटाने और तनाव कम करने पर सहमति बनी। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और थी। चीन ने समझौते के बावजूद गलवान घाटी में अपने कुछ ढांचे बनाए रखे, जिसने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। 15 जून की शाम, भारतीय सेना की 16 Bihar Regiment की एक verification patrol गलवान घाटी पहुँची। इस टीम का नेतृत्व Commanding Officer Colonel B. Santosh Babu कर रहे थे। उद्देश्य साफ था यह देखना कि क्या PLA ने वाकई समझौते के अनुसार अपने पोस्ट हटा लिए हैं। मौके पर पाया गया कि चीनी ढांचे अब भी मौजूद थे। इसी बिंदु पर दोनों पक्षों के बीच verbal confrontation शुरू हुई, जो देखते ही देखते नियंत्रण से बाहर हो गई। भारत और चीन के बीच 1996 Confidence Building Measures Agreement के तहत LAC पर firearms का प्रयोग प्रतिबंधित है। यही कारण है कि दोनों सेनाएँ आमतौर पर बिना बंदूक गश्त करती हैं। गलवान में भी कोई सैनिक firearm लेकर नहीं गया था। लेकिन जब स्थिति हिंसक हुई, तो यह झड़प एक brutal hand-to-hand combat में बदल गई जिसकी कल्पना भी आधुनिक युद्ध में नहीं की जाती। पत्थर, रॉड और कीलों वाले डंडे इस संघर्ष में हथियार बने पत्थर, लोहे की रॉड, लकड़ी के डंडे जिनमें कीलें लगी थीं, और शारीरिक हमला। भारतीय सैन्य सूत्रों और बाद की intelligence reports के अनुसार, PLA सैनिकों द्वारा prepared melee weapons का इस्तेमाल किया गया था, जो इस झड़प को और घातक बना गया। प्राकृतिक परिस्थितियाँ दुश्मन सिर्फ सामने नहीं था यह लड़ाई 14,000 feet से अधिक ऊँचाई पर pitch dark night में sub-zero temperature में
संकरी पहाड़ी ridges और नीचे बहती freezing Galwan River के बीच हुई कई भारतीय सैनिक पहाड़ी से धक्का दिए जाने के बाद नीचे गिर गए बर्फीली नदी में गिरने से hypothermia का शिकार हुए गंभीर सिर की चोट और अत्यधिक रक्तस्राव से मारे गए यह एक ऐसा संघर्ष था जिसमें environment खुद एक हथियार बन गया। भारत का नुकसान बलिदान जिसने देश को झकझोर दिया इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए। इनमें सबसे बड़ा नाम था Colonel B. Santosh Babu एक Commanding Officer जो अपने जवानों के साथ सबसे आगे खड़े थे। वे 1975 के बाद भारत-चीन सीमा पर शहीद होने वाले पहले CO बने। उनकी बहादुरी और नेतृत्व के लिए उन्हें posthumously Mahavir Chakra से सम्मानित किया गया। चीन ने शुरू में किसी भी तरह के casualties को स्वीकार नहीं किया। आधिकारिक आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए गए। हालाँकि, US intelligence reports, Russian assessments और Indian military estimates के अनुसार, इस झड़प में 40 से अधिक PLA soldiers मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए। कई महीनों बाद चीन ने पहली बार यह स्वीकार किया कि उसके सैनिक भी इस संघर्ष में मारे गए थे हालाँकि संख्या अब भी अस्पष्ट रखी गई।गलवान घाटी की घटना सिर्फ एक सैन्य झड़प नहीं थी, बल्कि यह भारत की strategic policy के लिए एक turning point बनी। इसके बाद भारत ने LAC पर force deployment बढ़ाया, border infrastructure को तेज़ी से विकसित किया, और चीन के खिलाफ economic और digital measures जैसे Chinese apps ban लागू किए। साथ ही, भारत-चीन संबंधों में भरोसे की जो परत थी, वह गहराई से टूट गई। गलवान घाटी की वो रात किसी घोषित युद्ध का हिस्सा नहीं थी, लेकिन वह युद्ध जैसी ही क्रूर, अराजक और निर्णायक थी। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें बंदूकें नहीं चलीं, लेकिन इतिहास ने करवट ली।
क्या दिल्ली की हवा हर सर्दी में ज़हरीली होना अब एक routine disaster बन चुका है? दिसंबर के आखिर में एक बार फिर राजधानी का Air Quality Index खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। कई इलाकों में AQI 380 से 450 Very Poor to Severe category रिकॉर्ड किया गया, जिससे आम लोगों का सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली की हवा एक बार फिर toxic trap बन गई? दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने की सबसे बड़ी वजह इस बार Weather Conditions हैं। सर्दियों में बनने वाला Temperature Inversion प्रदूषित हवा को ऊपर उठने नहीं देता। आमतौर पर गर्म हवा ऊपर जाती है और ठंडी हवा नीचे रहती है, लेकिन इन दिनों ज़मीन के पास ठंडी हवा और ऊपर गर्म हवा की परत बन गई है। इस वजह से PM2.5 और PM10 जैसे pollutants हवा में फंस जाते हैं और बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पाता। यही कारण है कि स्मॉग कई दिनों तक टिका रहता है। इसके साथ ही दिल्ली-NCR में Low Wind Speed भी एक बड़ा फैक्टर बन रही है। हवा की रफ्तार बेहद कम होने के कारण pollutant dispersion नहीं हो पा रहा। यानी जो धुआं और ज़हरीले कण निकल रहे हैं, वो वहीं जमा होते जा रहे हैं। ऊपर से Dense Fog और Smog formation ने हालात और बिगाड़ दिए हैं, जिससे visibility के साथ-साथ respiratory health भी प्रभावित हो रही है। अगर Pollution Sources की बात करें, तो 2025 में दिल्ली का प्रदूषण ज़्यादातर local emissions से आ रहा है। सबसे बड़ा योगदान Vehicular Emissions का है। पेट्रोल और डीज़ल वाहनों से निकलने वाला धुआं PM2.5 concentration को तेज़ी से बढ़ा रहा है। इसके अलावा, शहर में लगातार चल रहे Construction Activities से उड़ने वाली धूल PM10 levels को खतरनाक सीमा तक पहुंचा रही है। कई जगहों पर Dust Control Norms का पालन नहीं हो रहा, जिससे हालात और खराब हो गए हैं। औद्योगिक इलाकों और आसपास के क्षेत्रों में Industrial Emissions और Coal-based Power Plants से निकलने वाले Nitrogen Oxides और Sulphur Dioxide भी हवा की क्वालिटी बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, बिजली कटौती के दौरान इस्तेमाल होने वाले Diesel Generators भी सर्दियों में प्रदूषण को और बढ़ा देते हैं। अक्सर दिल्ली के प्रदूषण के लिए Stubble Burning को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन लेटेस्ट Central Pollution Control Board के आंकड़ों के मुताबिक इस बार पराली जलाने का योगदान PM2.5 में सिर्फ करीब 3 से 4% ही है। यानी इस समय दिल्ली की हवा खराब होने की मुख्य वजह बाहरी नहीं, बल्कि शहर के अंदर के स्रोत और मौसम की परिस्थितियां हैं। स्वास्थ्य के लिहाज़ से यह स्थिति बेहद गंभीर है। PM2.5 particles इतने सूक्ष्म होते हैं कि ये सीधे फेफड़ों के अंदर जाकर bloodstream तक पहुंच सकते हैं। इसका असर बच्चों, बुज़ुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। Asthma, Bronchitis, Heart Diseases और Lung Infections के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसी हवा में रहना chronic respiratory disorders को जन्म दे सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो दिल्ली की हवा फिर जहरीली होने के पीछे एक नहीं, बल्कि कई फैक्टर एक साथ काम कर रहे हैं Temperature Inversion, Low Wind Speed, High Vehicular Pollution, Construction Dust और Industrial Emissions। जब तक इन सभी पर एक साथ सख्त और स्थायी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर सर्दी में दिल्ली इसी तरह ज़हरीली हवा के चक्र में फंसती रहेगी।