क्या कोई सुपरस्टार अपनी peak popularity पर cinema छोड़ सकता है? क्या करोड़ों fans की worship के बावजूद कोई actor spotlight से हटकर ground politics चुन सकता है? Thalapathy Vijay ने यही किया है और इसी वजह से उनका Malaysia में किया गया ‘Last Dance’ वीडियो सिर्फ़ एक dance clip नहीं, बल्कि End of an Era का symbol बन गया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो Malaysia Kuala Lumpur का है, जहाँ विजय अपनी upcoming और आख़िरी फिल्म ‘Jana Nayagan’ Thalapathy 69 के audio launch और public event में dance करते नज़र आए। Fans इसे “Last Dance” इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यह वही event है जहाँ विजय ने साफ़ शब्दों में दोहराया कि यह उनका cinema में आख़िरी phase है। यह कोई scripted farewell नहीं था, बल्कि एक symbolic goodbye था जहाँ body language, emotion और timing सब कुछ बता रहा था कि यह सिर्फ़ एक performance नहीं, बल्कि final curtain call है।
विजय का retirement decision अचानक नहीं है। 2 February 2024 को उन्होंने officially अपनी political party Tamilaga Vettri Kazhagam लॉन्च की थी। उसी दिन उन्होंने साफ़ कहा था कि वे acting से step away करेंगे, current film commitments पूरी करेंगे, और उसके बाद full-time politics में उतरेंगे। उनका core argument था “If I truly care for my people, I must stand with them not just entertain them.” यानी cinema से influence बनाना काफी नहीं, अब वे policy, power और people-centric governance में सीधे उतरना चाहते हैं।
विजय हमेशा से अपने films में social justice, corruption, youth empowerment और political accountability जैसे themes को address करते आए हैं। अब उन्होंने माना कि Cinema is influence, Politics is execution। उनके मुताबिक सिर्फ़ screen पर लड़ना symbolic है, असली बदलाव system के अंदर जाकर आता है। Malaysia event के दौरान जब fans ने TVK और political slogans लगाने शुरू किए, विजय ने खुद हाथ जोड़कर उन्हें रोकने का gesture किया। इसका कारण साफ़ था event officially entertainment-focused था और host country के rules के अनुसार political messaging allowed नहीं थी। यह moment दिखाता है कि विजय अब सिर्फ़ actor नहीं, बल्कि एक disciplined political leader mindset के साथ चल रहे हैं। ‘Jana Nayagan’ को विजय की farewell film, एक political-social drama, और उनके real-life transition का cinematic reflection माना जा रहा है। Title itself Jana Nayagan Leader of the People उनके political narrative से direct connect करता है। Industry insiders मानते हैं कि यह फिल्म intentional exit strategy का हिस्सा है। अब विजय का roadmap पूरी तरह clear है। Tamilaga Vettri Kazhagam को grassroots level तक expand करना, cadre building, youth outreach और policy vision पर काम करना, और Tamil Nadu 2026 Assembly Elections की तैयारी करना यही उनका अगला कदम है। उन्होंने साफ़ कहा है कि “This is not a side project. This is my full-time commitment.” यानी यह celebrity politics नहीं, बल्कि long-term political investment है।
उन्नाव रेप केस के दोषी और पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगा दी है, जिससे साफ हो गया है कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई का नहीं, बल्कि कानून की व्याख्या और न्यायिक जिम्मेदारी का भी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सेंगर की जेल से बाहर आने की संभावनाओं पर फिलहाल पूरी तरह विराम लग गया है। दरअसल, 23 दिसंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की life sentence को suspend करते हुए उन्हें Section 389 CrPC के तहत जमानत दे दी थी। हाई कोर्ट का तर्क था कि सेंगर काफी लंबा समय जेल में बिता चुके हैं और उनकी अपील लंबित है, ऐसे में सजा को अस्थायी रूप से रोका जा सकता है। इसी आदेश के खिलाफ CBI ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, यह कहते हुए कि यह फैसला न केवल कानूनी रूप से सवालों के घेरे में है बल्कि इससे एक खतरनाक precedent भी स्थापित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने CBI की याचिका पर तुरंत सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जमानत आदेश पर interim stay लगा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले में विस्तृत सुनवाई नहीं होती, तब तक हाई कोर्ट का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि कुलदीप सिंह सेंगर जेल में ही रहेंगे और उन्हें फिलहाल किसी भी तरह की राहत नहीं मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को चार हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और संवेदनशील कानूनी सवाल POCSO Act के तहत “Public Servant” की परिभाषा को लेकर उठा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में यह संकेत दिया कि यदि एक कांस्टेबल या पटवारी को public servant माना जाता है, तो फिर एक निर्वाचित विधायक को उस श्रेणी से बाहर कैसे रखा जा सकता है। कोर्ट ने माना कि हाई कोर्ट की यह व्याख्या अगर स्वीकार कर ली जाती है, तो इससे कानून की आत्मा को गहरा नुकसान पहुंचेगा और भविष्य में गंभीर अपराधों में दोषियों को राहत मिलने का रास्ता खुल सकता है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तर्क भी रखा गया कि यह मामला सिर्फ एक अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े intimidation, witness threat, survivor safety और public confidence in justice system जैसे पहलू भी बेहद अहम हैं। उन्नाव रेप केस पहले ही देश की अंतरात्मा को झकझोर चुका है पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत, गवाहों पर हमले और सड़क दुर्घटना में पीड़िता के रिश्तेदारों की मौत जैसे तथ्य इस केस को सामान्य आपराधिक मामलों से अलग बनाते हैं। यह भी एक अहम तथ्य है कि कुलदीप सिंह सेंगर सिर्फ रेप केस में ही नहीं, बल्कि पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े एक अन्य मामले में 10 साल की सजा भी काट रहे हैं। ऐसे में भले ही किसी एक केस में जमानत मिलती, उनकी तत्काल रिहाई कानूनी रूप से पहले से ही जटिल थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद यह सवाल फिलहाल अप्रासंगिक हो गया है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में यह तय करेगा कि क्या दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत देते समय judicial discretion का सही इस्तेमाल किया या नहीं, और क्या POCSO जैसे संवेदनशील कानून में दोषी को इस तरह की राहत देना न्याय की भावना के अनुरूप है। आने वाली सुनवाई सिर्फ कुलदीप सिंह सेंगर की किस्मत तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि भारत में power, position और politics कानून से ऊपर हैं या नहीं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए एक मजबूत संदेश है जो मानते हैं कि न्याय भले देर से मिले, लेकिन अगर संवैधानिक संस्थाएं सजग रहें, तो न्याय का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता।