मध्य पूर्व की सियासत इन दिनों बम और मिसाइलों से आगे बढ़कर, बंद कमरों में हो रही बातचीतों से तय हो रही है। और पाकिस्तान जिसे बरसों से गुनाहगारों को पनाह देने के आरोप लगते रहे हों, वही आज जंग रुकवाने की कोशिशों के बीच खड़ा दिखे तो सवाल उठना लाज़मी है… आखिर पाकिस्तान इस पूरे जंग को रोकने में क्या रोल निभा रहा है? पाकिस्तान अपनी झूठी और दिखावे वाले चेहरे से आखिर क्या साबित करना चाहता है, हालांकि इसी सियासी शतरंज के बीच एक नाम बार-बार उभर रहा है अब्बास अराघची का। ईरान के विदेश मंत्री का 48 घंटे में तीसरी बार पाकिस्तान पहुंचना कोई सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं है, बल्कि यह उस बेचैनी का संकेत है जो ईरान-अमेरिका टकराव, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संकट और वैश्विक तेल राजनीति के बीच पैदा हो चुकी है। असल मामला यहीं से शुरू होता है। ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत लगभग ठप है। भरोसा इतना कमजोर हो चुका है कि दोनों देश एक-दूसरे से सीधे बात करने से बच रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान एक बीच का रास्ता बनकर सामने आया है। अराघची का बार-बार इस्लामाबाद जाना दरअसल एक तरह का शटल डिप्लोमेसी मिशन है जहां संदेश सीधे नहीं, बल्कि किसी तीसरे देश के जरिए भेजे जा रहे हैं। लेकिन सवाल फिर वही है कि आखिर पाकिस्तान ही क्यों? इसका जवाब कई परतों में छिपा है। पहली परत है रणनीतिक जरूरत। पाकिस्तान के अमेरिका के साथ पुराने रिश्ते रहे हैं, वहीं ईरान के साथ उसकी भौगोलिक और धार्मिक नजदीकियां हैं। यही वजह है कि वो दोनों के बीच कम्युनिकेशन ब्रिज बनने की कोशिश कर रहा है। दूसरी परत है पाकिस्तान की अपनी महत्वाकांक्षा। आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहे देश के लिए यह मौका है खुद को एक वैश्विक कूटनीतिक खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने का। अगर वह इस तनाव को कम कराने में थोड़ा भी सफल होता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ सकती है।
लेकिन इस मामले का दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा दिलचस्प और थोड़ा असहज करने वाला है। ईरान खुद पाकिस्तान की भूमिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर रहा। तेहरान के कई नेताओं ने साफ कहा है कि पाकिस्तान पूरी तरह न्यूट्रल नहीं है और उस पर अमेरिका का प्रभाव साफ दिखता है। यही वजह है कि अब तक जो भी बातचीत पाकिस्तान के जरिए हुई, वह ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। इस पूरी कूटनीति के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा है होर्मुज़ जलडमरूमध्य। दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने इस इलाके पर दबाव बनाकर पूरी दुनिया को यह संदेश दिया है कि अगर उसके साथ सख्ती होगी, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। यही वह बिंदु है जहां से अमेरिका और उसके सहयोगी देश चिंतित हैं, और यही वह कारण है जिसके चलते हर तरफ से सीजफायर और डायलॉग की कोशिशें तेज हो गई हैं। इस बीच पाकिस्तान में सिर्फ ईरानी विदेश मंत्री ही नहीं आ रहे। वहां लगातार उच्च स्तर के संपर्क हो रहे हैं चाहे वह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ हों या सेना प्रमुख आसिम मुनीर। ये मुलाकातें सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि उस बैकडोर डिप्लोमेसी का हिस्सा हैं जहां हर शब्द और हर संदेश का वजन होता है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में ओमान और रूस जैसे देश भी सक्रिय हैं। ईरान एक तरफ पाकिस्तान के जरिए अमेरिका तक बात पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, ताकि उसे एक मजबूत वैश्विक समर्थन मिल सके। यानी यह सिर्फ दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि एक बड़ा geopolitical power game है। अब अगर इस पूरी तस्वीर को एक लाइन में समझना हो, तो सच थोड़ा कड़वा है पाकिस्तान इस का केंद्र नहीं, बल्कि माध्यम है। वो इस जंग को खत्म नहीं कर रहा, बल्कि सिर्फ संदेशों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहा है। और इस कोशिश के पीछे उसकी अपनी जरूरतें और महत्वाकांक्षाएं भी उतनी ही बड़ी हैं जितनी कि शांति की बात। आखिर में सवाल फिर वहीं आकर खड़ा हो जाता है क्या पाकिस्तान सच में इस तनाव को कम कर पाएगा, या फिर वो सिर्फ एक ऐसे खेल का हिस्सा है जहां असली फैसले कहीं और लिए जा रहे हैं? क्योंकि फिलहाल जो दिख रहा है, वो शांति की कोशिश से ज्यादा एक कंट्रोल्ड टेंशन का खेल है, जहां जंग भी जारी है और बातचीत भी।
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच सीमा से सटे बेलगोरोड क्षेत्र एक बार फिर हमले का केंद्र बना, जहाँ यूक्रेन की ओर से किए गए ड्रोन अटैक में कम से कम तीन नागरिकों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। इस घटना की आधिकारिक पुष्टि क्षेत्र के गवर्नर व्याचेस्लाव ग्लैडकोव ने की। उनके अनुसार, हमले अलग-अलग स्थानों पर हुए, जहाँ ड्रोन सीधे रिहायशी इलाकों में गिरे, जिससे मकानों, निजी वाहनों और आसपास की संपत्ति को नुकसान पहुँचा। प्रारंभिक जानकारी में मृतकों की संख्या तीन बताई गई है, जबकि घायलों की संख्या अलग-अलग रिपोर्ट्स में अलग है, लेकिन यह स्पष्ट है कि हमले का असर आम नागरिकों पर पड़ा है, न कि केवल किसी सैन्य ठिकाने पर। बेलगोरोड क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इस तरह की घटनाओं को समझने में अहम है। यह इलाका यूक्रेन की सीमा से बेहद नजदीक है, इसलिए यहाँ ड्रोन और आर्टिलरी हमले अपेक्षाकृत आसान और तेज़ी से संभव होते हैं। पिछले एक साल में इस क्षेत्र में हमलों की आवृत्ति बढ़ी है, जहाँ यूक्रेन ने अपनी रणनीति के तहत रूस के अंदरूनी इलाकों को भी टारगेट करना शुरू किया है। खासतौर पर ड्रोन का इस्तेमाल इसलिए बढ़ा है क्योंकि यह कम लागत में लंबी दूरी तक जाकर सटीक निशाना साध सकता है और पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम को चुनौती देता है।
हमले की प्रकृति को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि ड्रोन का इस्तेमाल केवल सैन्य प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब ऐसे हमलों में रिहायशी क्षेत्रों के प्रभावित होने की घटनाएँ भी सामने आ रही हैं। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध के दौरान दोनों पक्ष एक-दूसरे पर नागरिक इलाकों को निशाना बनाने के आरोप लगाते रहे हैं, और स्वतंत्र रूप से हर घटना की पुष्टि करना कई बार संभव नहीं होता। इस मामले में जो जानकारी सामने आई है, वह मुख्य रूप से स्थानीय प्रशासन और रूसी अधिकारियों के बयानों पर आधारित है। रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यूक्रेन द्वारा रूस के भीतर इस तरह के ड्रोन हमले करना एक व्यापक सैन्य रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य केवल भौतिक नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि रूस के सीमावर्ती इलाकों में दबाव बनाना और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देना भी है। दूसरी ओर, रूस भी लगातार यूक्रेन के शहरों और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है, जिससे यह संघर्ष अब दोनों देशों के अंदरूनी क्षेत्रों तक फैल चुका है। इसमें तीन मौतों की पुष्टि उच्च स्तर की विश्वसनीयता के साथ की गई है, क्योंकि यह आधिकारिक बयान पर आधारित है, जबकि घायलों की सटीक संख्या अलग-अलग रिपोर्ट्स में भिन्न बताई जा रही है।
29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग के बीच पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना से आई खबर ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया क्या वोटर सच में आज़ाद है, या वो किसी दबाव में वोट डाल रहें है? इस बार आरोप सीधे तौर पर ममता दीदी के नेतृत्व वाली सरकार पर लगे है। दावा किया गया कि कुछ इलाकों में वोटर्स को डराने की कोशिश हो रही है, उन्हें यह महसूस कराया जा रहा है कि गलत बटन दबाया तो अंजाम ठीक नहीं होगा। यह आरोप अमित मालवीय की तरफ से सामने आया, जिन्होंने कहा कि खासकर हिंदू वोटर्स को टारगेट किया जा रहा है, लेकिन बंगाल की राजनीति की खासियत यही है यहाँ कोई आरोप अकेला नहीं चलता। TMC की तरफ से तुरंत जवाब आया कि यह सब एक राजनीतिक स्क्रिप्ट है, जिसका मकसद चुनावी माहौल को प्रभावित करना है। उनका आरोप उल्टा था कि केंद्रीय एजेंसियाँ और सुरक्षा बल ही उनके कार्यकर्ताओं और वोटर्स पर दबाव बना रहे हैं। यानी एक ही घटना के दो बिल्कुल अलग नैरेटिव एक कहता है हमें डराया जा रहा है, दूसरा कहता है हमें फंसाया जा रहा है। और सच इन दोनों के बीच कहीं फंसा रह जाता है। ग्राउंड से जो तस्वीर निकलकर आती है, वह और भी जटिल है। कहीं एक उम्मीदवार के परिवार का आरोप है कि उन पर हमला करने की कोशिश हुई, तो कहीं ISF कैंडिडेट भी कहता है कि वोटर्स को बूथ तक आने से रोका जा रहा है। इसी बीच उत्तर 24 परगना में ही नकदी बांटने के आरोप में बीजेपी नेताओं की गिरफ्तारी की खबर सामने आती है जो यह बताती है कि चुनावी खेल सिर्फ डराने तक सीमित नहीं, बल्कि लुभाने तक भी फैला हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा कुछ पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई यह संकेत देती है कि सिस्टम के अंदर भी सब कुछ सामान्य नहीं है। यानी तस्वीर साफ नहीं, बल्कि धुंधली है जहाँ हर तरफ कुछ न कुछ हो रहा है, लेकिन पूरी सच्चाई किसी एक तरफ नहीं झुकती। अब सबसे बड़ा सवाल क्या ये आरोप सच हैं? इसका जवाब उतना सीधा नहीं है जितना टीवी डिबेट्स में दिखता है। अभी तक इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न चुनाव आयोग ने किसी एक पक्ष को दोषी ठहराया है, न ही कोई ऐसा पुख्ता सबूत सामने आया है जो एकतरफा सच्चाई को साबित कर सके। इसका मतलब यह नहीं कि घटनाएँ नहीं हुईं, बल्कि यह कि जो भी हुआ है, वह अभी आरोप की श्रेणी में है, साबित तथ्य की नहीं। और अगर इस मामले को थोड़ा पीछे ले जाएँ, तो यह कोई नई पटकथा नहीं है। बंगाल का चुनावी इतिहास खुद इस बात का गवाह है कि यहाँ हर चुनाव के साथ हिंसा और डर शब्द जुड़ जाते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी बूथ कैप्चरिंग, राजनीतिक झड़पों और वोटर इंटिमिडेशन के आरोपों ने सुर्खियाँ बटोरी थीं। और यह सिर्फ बंगाल की कहानी नहीं है देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नेताओं पर समय-समय पर ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं। कभी पीएम मोदी की सरकार पर एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगता है, तो कभी Akhilesh Yadav चुनावी मशीनरी पर सवाल उठाते हैं, तो कभी Arvind Kejriwal खुलकर कहते हैं कि राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है। यानी डर अब भारतीय चुनावी शब्दकोश का स्थायी हिस्सा बन चुका है बस चेहरे और राज्य बदलते रहते हैं। इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर पार्टी खुद को पीड़ित और सामने वाले को दोषी बताती है। कोई यह नहीं कहता कि हमारी तरफ से गलती हुई। और यही लोकतंत्र का सबसे जटिल पहलू भी है जहाँ सच्चाई अक्सर दो विरोधी दावों के बीच कहीं दब जाती है। बंगाल में इस बार भी वही हो रहा है। माहौल जरूर तनावपूर्ण है, घटनाएँ भी सामने आई हैं, लेकिन एकतरफा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी। आखिर में सवाल वही है, जो हर चुनाव के बाद भी अनुत्तरित रह जाता है क्या भारत का वोटर सच में पूरी तरह आज़ाद है, या हर बार चुनाव के साथ एक अदृश्य दबाव भी चलता है? जुड़े रहिए हमारे साथ आगे की अपडेट के लिए।