क्या धुरंधर 2 सच में पोस्टपोन वाली है, कुछ दिन पहले सेट से वीडियो लीक हुआ था, और शूटिंग अभी भी चल रही है, सामने टॉक्सिक जैसी बड़ी फिल्म खड़ी है तो क्या मेकर्स डेट चेंज कर देंगे? सवाल बहुत हैं, लेकिन जवाब ठंडे दिमाग से देखने होंगे। बड़ी फिल्मों की शूटिंग अक्सर रिलीज़ से ठीक पहले तक चलती रहती है। पैचवर्क, री-शूट, एक्शन सीक्वेंस का एक्स्ट्रा एंगल ये सब नॉर्मल प्रोसेस है। सिर्फ इसलिए कि सेट से संजय दत्त का एक्शन लुक बाहर आ गया, ये मान लेना कि फिल्म तैयार नहीं है, ये जल्दीबाज़ी होगी। अभी तक रिलीज़ डेट 19 मार्च 2026 बदली नहीं गई है और मेकर्स की तरफ से पोस्टपोन की कोई ऑफिशियल घोषणा नहीं है। यानी पोस्टपोन वाली खबर फिलहाल अफवाह की कैटेगरी में है। अब असली बात क्लैश की है, क्योंकि उसी दिन टॉक्सिक भी रिलीज हो रही है। पैन-इंडिया स्टारडम, डार्क स्टाइल और पहले से बना फैन बेस मार्केट में उसका भी जबरदस्त क्रेज है। जब दो बड़ी फिल्में एक ही दिन आती हैं तो डर फिल्म से नहीं, स्क्रीन काउंट से होता है। मल्टीप्लेक्स में शो बंटेंगे, सिंगल स्क्रीन में प्राथमिकता तय होगी, और पहले वीकेंड का नंबर ही पूरा नैरेटिव सेट कर देता है। धुरंधर 2 को अपने पहले पार्ट की सफलता का फायदा है एक्शन, पॉलिटिकल ड्रामा और स्टार पावर का कॉम्बिनेशन मास ऑडियंस को खींच सकता है। वहीं टॉक्सिक का विजुअल टोन और “एडल्ट फेयरीटेल” टैग अर्बन और यंग ऑडियंस को टारगेट कर रहा है। सोशल मीडिया पर फैन वॉर शुरू हो चुका है, ट्रेंड और एडिट्स से माहौल गर्म है, लेकिन असली गेम ओपनिंग डे के मॉर्निंग शो से शुरू होगा। पोस्टपोन होना इंडस्ट्री में नामुमकिन नहीं है, फैसले आखिरी वक्त पर बदलते भी हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं है। बॉक्स ऑफिस की टक्कर नई बात नहीं है। इससे पहले भी बड़ी फिल्मों ने एक-दूसरे के सामने रिलीज़ होकर रिस्क लिया है। कभी ये दांव भारी पड़ा, कभी दोनों फिल्मों का कलेक्शन आधा-आधा बंट गया। इंडस्ट्री की हिस्ट्री बताती है कि जब दो मेगा प्रोजेक्ट आमने-सामने आते हैं तो असली लड़ाई कंटेंट से ज्यादा स्क्रीन काउंट और ओपनिंग वीकेंड की होती है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि क्लैश के शोर ने ओपनिंग को और बड़ा बना दिया, क्योंकि ऑडियंस जिज्ञासा में दोनों फिल्में देख बैठी। लेकिन उतने ही उदाहरण ऐसे भी हैं जहां क्लैश ने संभावित ब्लॉकबस्टर को सिर्फ हिट बनाकर छोड़ दिया। यानी ये शतरंज है एक चाल गलत, और करोड़ों का खेल बदल सकता है। सीक्वल फिल्मों का अपना अलग मनोविज्ञान होता है। अगर पहला पार्ट हिट रहा हो तो दूसरे भाग से उम्मीदें दोगुनी हो जाती हैं, लेकिन रिस्क भी उतना ही बढ़ता है। ऑडियंस सिर्फ कहानी नहीं, अपग्रेड देखने आती है बड़ा स्केल, ज्यादा इमोशन, ज्यादा एक्शन। अगर उन्हें लगे कि पार्ट 2 में नया कुछ नहीं है, तो वही दर्शक सबसे पहले सोशल मीडिया पर निराशा लिख देते हैं। दूसरी तरफ, अगर फिल्म उम्मीद से बड़ी निकल जाए, तो वही ऑडियंस उसे कल्ट बना देती है। इसी वजह से धुरंधर कल्ट बन गई है ।
मिडिल ईस्ट में जो हो रहा है, वह अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ दुनिया के बड़े पावर सेंटर सीधे समीकरण में आ चुके हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि अगर यह चेन रिएक्शन बढ़ा, तो दुनिया कितनी दूर तक हिलेगी। घटनाओं की रफ्तार इतनी तेज रही कि 72 घंटे में पूरा नैरेटिव बदल गया। इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने अचानक अमेरिकी मौजूदगी को भी फ्रंटलाइन पर ला दिया। बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना का बड़ा ठिकाना US Fifth Fleet खतरे के दायरे में आया। यह बेस कोई साधारण सैन्य ढांचा नहीं है यह खाड़ी में अमेरिका की सामरिक पकड़ का केंद्र है। अगर यहां मिसाइल खतरा मंडरा रहा है, तो यह सीधे अमेरिका को संकेत है। उधर United Arab Emirates के आसमान में एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव होते दिखे। इंटरसेप्शन की चमकती लकीरें वे यह बता रही थीं कि युद्ध अब सीमाओं से बाहर फैल चुका है। एयरस्पेस बंद, फ्लाइट्स डायवर्ट, ट्रैवल अलर्ट जारी ये सब युद्धकालीन संकेत हैं। ब्रिटेन ने अपने जहाजों को हाई अलर्ट पर रखा। शिपिंग कंपनियों को कहा गया कि फारस की खाड़ी और आसपास के संवेदनशील रूट पर सावधानी बरतें। यह वही समुद्री रास्ता है जहाँ से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। अगर यहां कोई बड़ा हमला होता है, तो असर सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं रहेगा तेल की कीमतें उछलेंगी, स्टॉक मार्केट गिरेंगे, और वैश्विक सप्लाई चेन हिलेगी। कुवैत और अन्य देशों ने उड़ानें रोक दीं। इंटरनेशनल एयरलाइंस ने अपने रूट बदल दिए। यह सब बताता है कि खतरा “संभावना” नहीं, “वास्तविक” माना जा रहा है। जब नागरिक उड्डयन प्रभावित होता है, तो दुनिया समझ जाती है कि हालात गंभीर हैं। अब सवाल आता है क्या यह वर्ल्ड वॉर है? तकनीकी रूप से नहीं। किसी देश ने औपचारिक घोषणा नहीं की। लेकिन आधुनिक युद्धों में घोषणाएं कम, कार्रवाई ज्यादा होती है। ड्रोन, साइबर अटैक, प्रॉक्सी ग्रुप, मिसाइल नेटवर्क यह सब मिलकर एक मल्टी-लेयर कॉन्फ्लिक्ट बनाते हैं। यही वजह है कि कई विश्लेषक इसे World War 3.0 का ट्रेलर कह रहे हैं। रिपोर्टों में राजधानी क्षेत्रों के संवेदनशील इलाकों के आसपास धमाकों की आवाज़ें सुनाई देने की बात कही गई। हालांकि किसी राष्ट्रपति निवास पर सीधे हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन अगर सत्ता के केंद्र के आसपास धमाके महसूस हो रहे हैं, तो यह बताता है कि युद्ध की रेखा बहुत आगे खिंच चुकी है। यह 20वीं सदी वाला विश्व युद्ध नहीं होगा। यह हाई-टेक, हाई-स्पीड और हाई-स्टेक्स वाला संघर्ष होगा। इसमें मिसाइलें चलेंगी, लेकिन साथ में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक नेटवर्क भी टारगेट होंगे।
दुनिया फिलहाल देख रही है। अमेरिका, यूरोप, एशिया सबकी नजर मिडिल ईस्ट पर है। अगर यह आग और भड़की, तो यह सिर्फ एक क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा। यह वर्ल्ड की शक्ति संतुलन की नई परिभाषा बन सकता है।
तेल अवीव की रात अचानक सायरन से गूँज उठी। मोबाइल पर अलर्ट आया। लोग बंकरों की तरफ भागे। और कुछ ही मिनटों में साफ हो गया यह रूटीन ड्रिल नहीं, असली हमला है। ईरान ने दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। कुछ रिपोर्टों में संख्या 70 तक बताई गई। इज़रायल की एयर डिफेंस सिस्टम Iron Dome एक्टिव हो गई। कई मिसाइलें हवा में ही इंटरसेप्ट की गईं। लेकिन हर इंटरसेप्शन के बावजूद तनाव बना रहा क्योंकि 100% सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं दे सकता। यह हमला अचानक नहीं था। यह महीनों से बढ़ते तनाव का परिणाम था। इज़रायल की सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान ने यह मिसाइल बैराज शुरू किया। इसके साथ ही लेबनान में सक्रिय Hezbollah और यमन के हूती समूह भी एक्टिव हुए। इज़रायल के लिए यह एक मल्टी-फ्रंट चुनौती बन गई। रणनीतिक तौर पर यह बड़ा बदलाव है। एक तरफ ईरान अपनी मिसाइल रेंज और संख्या का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी तरफ इज़रायल टेक्नोलॉजी और एयर डिफेंस पर भरोसा कर रहा है। यह मात्रा बनाम सटीकता की लड़ाई है।
रिपोर्टों में राजधानी क्षेत्रों के आसपास धमाकों की आवाज़ें सुनाई देने की बात सामने आई। हालांकि राष्ट्रपति निवास के सीधे हिट होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन हाई-सिक्योरिटी ज़ोन तक धमाकों की गूँज यह दिखाती है कि संघर्ष अब बेहद संवेदनशील स्तर पर पहुँच चुका है। इज़रायल ने भी जवाबी स्ट्राइक की। लक्षित सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई जारी है। दोनों देशों की बयानबाज़ी सख्त हो चुकी है। आत्मरक्षा और सुरक्षा के शब्द अब मिसाइलों के साथ चल रहे हैं। नागरिक असर साफ दिख रहा है स्कूल बंद, शेल्टर खुले, फ्लाइट्स प्रभावित हुए है। बड़ा खतरा यह है कि अगर किसी बड़े शहर में भारी नागरिक नुकसान होता है, तो यह टकराव पूरी तरह खुली जंग में बदल सकता है। अभी तक यह मिसाइल और जवाबी मिसाइल का खेल है, लेकिन हर अगला कदम दांव बड़ा कर रहा है। आइए जानते है अगर यह जंग 30 दिन चली तो दुनिया पर क्या असर होगा? पहले तीन दिन सबसे खतरनाक होते हैं। क्योंकि यहीं तय होता है कि मामला सीमित रहेगा या फैल जाएगा। मिसाइलें चलती हैं, एयर डिफेंस एक्टिव होता है, सायरन बजते हैं। लेकिन असली असर मिसाइल से ज्यादा मार्केट में दिखता है। तेल की कीमतें उछलती हैं। फारस की खाड़ी से रोज़ लाखों बैरल तेल गुजरता है। अगर उस रूट पर खतरा बढ़ा, तो ग्लोबल सप्लाई चेन हिल जाती है। दिल्ली, मुंबई, लंदन, न्यूयॉर्क हर जगह पेट्रोल महंगा होता है। अगर जंग दस दिन पार करती है, तो वह सिर्फ दो देशों के बीच नहीं रहती। लेबनान में सक्रिय Hezbollah, यमन के हूती, इराक के शिया मिलिशिया सब सक्रिय हो सकते हैं।
अगर संघर्ष 20 दिन पार करता है, तो यूरोप और एशिया दोनों प्रभावित होंगे। भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, उन्हें झटका लगेगा। रुपए पर दबाव बढ़ सकता है। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र और बड़े देश सीज़फायर की कोशिश करेंगे। लेकिन अगर दोनों पक्ष “पीछे नहीं हटेंगे” वाली पॉलिसी पर रहे, तो तनाव और बढ़ेगा। तीस दिन होते ही अगर किसी बड़े शहर में भारी नागरिक नुकसान होता है, तो अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद बदले की कार्रवाई तेज हो सकती है। यह खुली जंग में बदल सकता है। लेकिन शायद ऐसा नहीं होना चाहिए वरना लाखों की कुर्बानी सिर्फ जिद्द के कारण हो जाएगी ।