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Breaking News 27 December 2025

1 ) Netflix की Stranger Things ने रच दिया इतिहास

 क्या कोई वेब सीरीज सच में पूरी दुनिया को रोक सकती है? क्या कोई शो ऐसा हो सकता है जिसे देखने के लिए लोग नींद, काम और सोशल लाइफ तक भूल जाएँ? Netflix की Stranger Things इन सवालों का सबसे बड़ा जवाब बनकर सामने आई है। 2016 में शुरू हुई यह Sci-Fi Horror Drama सिर्फ एक सीरीज नहीं रही, बल्कि एक Global Cultural Phenomenon बन गई और अब इसने ऐसे रिकॉर्ड बना दिए हैं, जिन्हें तोड़ना आसान नहीं। Netflix पर सबसे बड़ा English-Language Series Launch Stranger Things ने Netflix के इतिहास में सबसे बड़ा English-language series launch दर्ज किया है। Series के नए सीज़न के रिलीज़ होते ही शुरुआती कुछ ही दिनों में इसे करीब 59million views मिले, जो किसी भी English-language Netflix series के लिए अब तक का सबसे बड़ा opening performance माना जा रहा है। यह आंकड़ा Netflix के internal viewing metrics और industry tracking data पर आधारित है। यह रिकॉर्ड साफ दिखाता है कि Stranger Things सिर्फ एक popular show नहीं, बल्कि Netflix की सबसे बड़ी viewer-magnet property बन चुका है। Viewership में Time-Spent का ऐतिहासिक रिकॉर्ड केवल views ही नहीं, बल्कि दर्शकों ने इस सीरीज पर जो समय बिताया, वह भी इतिहास बन गया। Industry measurement agency Nielsen के मुताबिक, Stranger Things के नए episodes ने पहले ही हफ्ते में 8.46 billion minutes यानी लगभग 284 million hours की total watch-time दर्ज की। Streaming platforms में असली ताकत views से ज्यादा watch-time को माना जाता है, और इस मामले में Stranger Things ने Netflix के लगभग सभी पुराने रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ दिया। Global Top 10 में सभी Seasons का एक साथ ट्रेंड करना Stranger Things ने एक और अनोखा रिकॉर्ड बनाया इसके सभी seasons एक ही समय पर Netflix Global Top 10 list में ट्रेंड करने लगे। इसका मतलब साफ है: दर्शक सिर्फ नया season नहीं देख रहे थे, बल्कि पुराने seasons को भी दोबारा binge-watch कर रहे थे। Streaming industry में इसे Long-Tail Engagement कहा जाता है, और यही किसी शो की असली longevity को साबित करता है। Season 4 के पुराने रिकॉर्ड, जो आज भी Benchmark हैं Stranger Things का Season 4 पहले ही Netflix इतिहास का सबसे ज़्यादा देखा गया season बन चुका था। Netflix के official Tudum data के अनुसार 140.7 million views, 1.838 billion hours watched पहले 28 दिनों में । ये आंकड़े इतने बड़े थे कि Season 4 लंबे समय तक Netflix का Most-Watched English-Language Season बना रहा। बाद के seasons ने इन्हीं रिकॉर्ड्स को चुनौती दी। Cultural Impact सिर्फ शो नहीं, एक Movement Stranger Things का असर सिर्फ numbers तक सीमित नहीं है। इस सीरीज ने 80s Pop Culture को दोबारा global mainstream में ला दिया, Music industry में पुराने गानों को viral बना दिया, Fashion, memes और social media trends को dominate किया। Streaming world में इसे Cross-Platform Cultural Impact कहा जाता है, जहाँ एक शो entertainment से आगे जाकर culture shape करने लगता है। तो क्यों Stranger Things इतना बड़ा बन गया? तो Stranger Things की सफलता के पीछे कई factors हैं  Nostalgia + Modern Storytelling  1980s की aesthetics को modern VFX और cinematic horror के साथ जोड़ा गया। Strong Character-Driven Narrative हर character emotionally relatable है, सिर्फ plot-device नहीं। Global Accessibility Netflix की dubbing और subtitles strategy ने इसे worldwide audience तक पहुँचाया। Binge-Watch Friendly Format Cliffhangers और episode pacing ने viewers को लगातार देखने पर मजबूर किया।

 

2.)  रेपिस्ट को कब तक बचाओगे?

इस देश में एक सवाल अब फुसफुसाहट नहीं रहा, यह चीख बन चुका है  रेपिस्ट को आखिर कब तक बचाया जाएगा? क्योंकि बार-बार वही तस्वीर सामने आती है। रेप जैसे घिनौने अपराध, बड़े-बड़े नाम, और उसके बाद चुपचाप मिलती बेल, पैरोल या राहत। आसाराम को मिल जाती है, राम रहीम को मिल जाती है, रसूखदार लोगों को रास्ता मिल जाता है। और सरकार हर बार आंखें फेर लेती है। सवाल सीधा है  अगर अपराध इतना जघन्य है कि अदालतें दोषी ठहराती हैं, तो फिर ये लोग जेल के बाहर कैसे घूम रहे हैं? क्या कानून की धार सिर्फ कमजोरों के लिए तेज है? क्या ताकतवर लोगों के लिए कानून सिर्फ कागज़ का नियम बनकर रह गया है? आसाराम पर नाबालिग से बलात्कार का दोष साबित हुआ। यह कोई आरोप नहीं, यह अदालत का फैसला है। फिर भी मेडिकल बेल, अंतरिम राहत, बार-बार इंसानियत का हवाला। सरकार से सवाल है  क्या इंसानियत सिर्फ दोषियों के लिए बची है? पीड़ितों के लिए क्यों नहीं? राम रहीम को रेप और हत्या जैसे मामलों में सजा मिली। इसके बावजूद बार-बार पैरोल और फरलो दी गई। हर बार दलील वही  कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक प्रक्रिया, सामाजिक शांति। लेकिन सरकार यह नहीं बताती कि जब एक सजा पाया हुआ रेपिस्ट बाहर आता है, तो उस समाज की शांति का क्या होता है जिसने न्याय पर भरोसा किया था? यह सिर्फ दो नाम नहीं हैं। यह एक पैटर्न है। जिसके पीछे ताकत है, भीड़ है, राजनीतिक संवेदनशीलता है  उसके लिए जेल एक अस्थायी पड़ाव बन जाती है। और सरकार इस पूरे खेल को “न्यायिक प्रक्रिया” कहकर धोती रहती है। अब उन्नाव रेप केस को देखिए। एक विधायक पर रेप का आरोप लगता है। पुलिस चुप रहती है, प्रशासन चुप रहता है, सत्ता चुप रहती है। पीड़िता को खुद को आग लगाने की कोशिश करनी पड़ती है, तब जाकर सिस्टम हिलता है। क्या यही सरकार का एक्शन है? क्या न्याय मांगने की यही कीमत है? हां, बाद में सजा हुई। लेकिन सरकार यह नहीं बताती कि अगर राष्ट्रीय आक्रोश न होता, अगर मीडिया दबाव न होता, तो क्या यह सजा कभी होती? सरकार बार-बार कहती है  बेल कोर्ट देती है, सरकार नहीं। लेकिन सरकार यह क्यों नहीं बताती कि रेप जैसे अपराधों में दोषियों के लिए अब तक कोई सख़्त नीति क्यों नहीं बनाई गई? क्यों मेडिकल बेल और पैरोल के दुरुपयोग पर आज तक कोई ठोस कानून नहीं लाया गया? यह चुप्पी अब मासूम नहीं लगती। यह चुप्पी अब मिलीभगत जैसी दिखती है। जब बड़े नामों को राहत मिलती है, तो यह सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं होता, यह एक सार्वजनिक संदेश होता है  कि अगर तुम ताकतवर हो, तो कानून तुम्हारे सामने झुक सकता है। सरकार को यह समझना होगा कि यह सवाल विपक्ष नहीं पूछ रहा, यह सवाल सोशल मीडिया नहीं पूछ रहा, यह सवाल देश पूछ रहा है। क्यों हर बार पीड़िता को लड़ना पड़ता है और दोषी को रास्ता मिल जाता है? क्यों इस देश में सजा नहीं, कनेक्शन काम करता है? आज सवाल साफ है और सीधा है  रेपिस्ट को कब तक बचाओगे? जब तक सरकार इस सवाल का जवाब नहीं देती, तब तक हर बेल, हर पैरोल, सरकार की नीयत पर सवाल बनकर खड़ी रहेगी।

 

3.) मनरेगा पर सड़कों से संसद तक हंगामा ! आखिर क्यों ? 

क्या देश की सबसे बड़ी rural employment guarantee scheme को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है? क्या गरीबों के लिए बना कानून अब सिर्फ नाम बदलने और संरचना बदलने तक सीमित हो गया है? और सबसे बड़ा सवाल क्या मनरेगा सिर्फ एक योजना थी, या यह गरीबों का संवैधानिक अधिकार था, जिसे अब कमजोर किया जा रहा है? इन्हीं सवालों के बीच देशभर में मनरेगा को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं और कांग्रेस ने इसे लेकर nationwide agitation का ऐलान कर दिया है। दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा MGNREGA Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act को हटाकर उसके स्थान पर नया कानून Viksit Bharat Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission Gramin Act, 2025 लागू किए जाने के बाद सियासी तापमान अचानक बढ़ गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे महज policy reform नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों पर सीधा हमला बता रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने बिना व्यापक stakeholder consultation और राज्यों से सलाह लिए एक ऐसा फैसला लिया, जो ग्रामीण भारत की आर्थिक सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। कांग्रेस का सबसे बड़ा विरोध नाम परिवर्तन को लेकर है। पार्टी का कहना है कि महात्मा गांधी का नाम हटाना सिर्फ एक प्रतीकात्मक बदलाव नहीं, बल्कि गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से दूरी बनाने की कोशिश है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पार्टी नेतृत्व ने इसे “conspiracy to erase Gandhian legacy” करार दिया है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने “MNREGA Bachao Abhiyan” की घोषणा की है, जो जनवरी 2026 से देशभर में शुरू होगा। हालांकि सरकार का तर्क है कि नया कानून अधिक efficient, outcome-oriented और future-ready rural employment model पेश करता है। नए Act में रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 days करने, skill-linked work, और asset creation पर ज्यादा ज़ोर देने की बात कही गई है। लेकिन विपक्ष का दावा है कि कागजों में फायदे दिखाने के बावजूद ज़मीनी हकीकत यह है कि demand-driven employment guarantee, जो मनरेगा की आत्मा थी, उसे कमजोर कर दिया गया है। विपक्ष का दूसरा बड़ा आरोप funding mechanism और cost-sharing structure को लेकर है। कांग्रेस और कई राज्य सरकारों का कहना है कि नए कानून के तहत केंद्र का वित्तीय बोझ कम कर दिया गया है और राज्यों पर ज्यादा जिम्मेदारी डाल दी गई है। इससे गरीब राज्यों पर financial pressure बढ़ेगा और अंततः मजदूरों को मिलने वाला काम और भुगतान प्रभावित होगा। पहले से ही pending wages, delayed payments, और reduced allocation जैसे मुद्दों से जूझ रही ग्रामीण आबादी के लिए यह बदलाव और असुरक्षा पैदा कर सकता है। यही वजह है कि विरोध सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं है। कई राज्यों में labour unions, rural workers’ organisations, और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए हैं। पंजाब, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में धरने, ज्ञापन और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किए गए हैं। इन संगठनों का कहना है कि मनरेगा सिर्फ रोजगार योजना नहीं, बल्कि social safety net थी, जो आर्थिक संकट के समय ग्रामीण गरीबों के लिए आखिरी सहारा बनती थी। राजनीतिक तौर पर देखें तो विपक्ष इसे सिर्फ नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि political narrative building का अवसर भी मान रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार पहले ही कई welfare schemes के बजट में कटौती कर चुकी है और अब मनरेगा के कानूनी ढांचे को बदलकर उसे धीरे-धीरे अप्रभावी बनाया जा रहा है। विपक्ष इसे “anti-poor governance model” का हिस्सा बता रहा है, खासकर ऐसे समय में जब महंगाई और बेरोजगारी ग्रामीण भारत को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है। कुल मिलाकर, मनरेगा को लेकर देश में जो विरोध चल रहा है, वह सिर्फ एक योजना या कानून का विवाद नहीं है। यह बहस इस सवाल पर आकर टिक जाती है कि क्या रोजगार गारंटी एक अधिकार रहेगा या सिर्फ सरकार की इच्छा पर निर्भर स्कीम बनकर रह जाएगा? कांग्रेस और विपक्ष इसी सवाल को जनता के बीच ले जाना चाहते हैं, जबकि सरकार इसे सुधार और विकास की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़कों से संसद और चुनावी राजनीति तक और तेज होने वाला है।