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Breaking News 26 December 2025

1)  दिल्ली से कोलकाता तक क्यों सुलग रहा है बांग्लादेश हिंसा का मुद्दा

अगर यह सिर्फ एक घटना होती, तो शायद अब तक ख़त्म हो चुकी होती। अगर यह सिर्फ गुस्से की लहर होती, तो शायद शांत हो गई होती। लेकिन बांग्लादेश में हिंदू युवक की हत्या के बाद जो कुछ हो रहा है, वह यह साफ़ बताता है कि यह मामला अब एक घटना नहीं, बल्कि एक ongoing crisis बन चुका है। यही वजह है कि नई दिल्ली से लेकर कोलकाता तक विरोध-प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब तक क्या बदला? जवाब है ज़्यादा कुछ नहीं। नई दिल्ली में Bangladesh High Commission के बाहर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों को बार-बार extra deployment करनी पड़ रही है। प्रदर्शनकारी सिर्फ गुस्सा नहीं जता रहे, बल्कि international accountability की मांग कर रहे हैं। यह विरोध सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है यह diplomatic space में दबाव बना चुका है। हालांकि अब यह मुद्दा पश्चिम बंगाल और खासकर कोलकाता तक पहुंच चुका है। यह कोई संयोग नहीं है। कोलकाता ऐतिहासिक रूप से बांग्लादेश से जुड़े मानवीय मुद्दों, शरणार्थी संकट, और minority rights का संवेदनशील केंद्र रहा है। यहां हो रहे प्रदर्शन यह संकेत दे रहे हैं कि लोगों को डर है कि “अगर आज चुप रहे, तो यह सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेगा।” तो आग ठंडी क्यों नहीं हो रही अब तक ऐसी कोई निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आई जिससे यह भरोसा बने कि दोषियों को सज़ा मिलेगी। जब justice delayed दिखता है, तो public anger बढ़ता है। घटना के बाद बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों से minority areas में हिंसा, घरों में आग, और डर का माहौल जैसी रिपोर्ट्स आती रहीं। हर नई खबर पुराने ज़ख्म को फिर से खोल देती है। एक तरफ कहा जा रहा है कि यह “law and order issue” है, दूसरी तरफ लोग इसे religious persecution मान रहे हैं। जब सच्चाई पर अलग-अलग परदे डाले जाते हैं, तो मामला शांत नहीं होता। वीडियो, तस्वीरें और eyewitness accounts ने इस केस को दबने नहीं दिया। यह अब सिर्फ खबर नहीं, बल्कि collective conscience का हिस्सा बन चुका है। यह मामला इसलिए नहीं थम रहा क्योंकि लोग यह सवाल पूछ रहे हैं
“अगर आज Dipu था, तो कल कौन?”  यह सिर्फ बांग्लादेश का मामला क्यों नहीं रह गया? जब किसी देश में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा होती है और उस पर स्पष्ट, पारदर्शी और कठोर कार्रवाई नहीं दिखती, तो वह मुद्दा international concern बन जाता है। इसीलिए दिल्ली में प्रदर्शन हो रहे हैं, कोलकाता में आवाज़ उठ रही है, और यह मामला राजनयिक चुप्पी से बाहर निकल चुका है सवाल जो अभी भी हवा में हैं
क्या दोषियों को वास्तव में सज़ा मिलेगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा? क्या blasphemy जैसे आरोप अब भी भीड़ के हाथों मौत का लाइसेंस बने रहेंगे? और क्या हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहेगी?  दिसंबर 2025 में बांग्लादेश में हिंदू युवक Dipu Chandra Das को धार्मिक आरोपों के बाद भीड़ ने पीटा,
पेड़ से बांधा और जिंदा जला दिया। यही घटना आज तक इस पूरे विवाद की जड़ बनी हुई है। यह मामला इसलिए भी शांत नहीं हो रहा क्योंकि यह एक मौत की कहानी नहीं, बल्कि डर, न्याय और जवाबदेही की लड़ाई बन चुका है। और जब तक सिर्फ बयान नहीं, बल्कि स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आती तब तक यह आग यूँ ही सुलगती रहेगी।

 

2 )  जहाँ BJP नहीं थी, वहीं से सत्ता की हुई शुरुआत!

केरल की राजनीति अब तक जिस ढर्रे पर चलती रही है, तिरुवनंतपुरम नगर निगम में हुआ मेयर चुनाव उस ढर्रे को तोड़ता हुआ दिखाई देता है। राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम में BJP के V.V. Rajesh का मेयर चुना जाना महज़ एक municipal event नहीं, बल्कि केरल के राजनीतिक परिदृश्य में एक symbolic breakthrough के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल यही है क्या यह केरल में BJP का पहला बड़ा वार है, और अगर हाँ, तो अब तक यह पार्टी यहाँ कमजोर क्यों रही? कैसे चुने गए V.V. Rajesh Numbers ही कहानी कहते हैं तिरुवनंतपुरम नगर निगम की कुल 101 सदस्यीय council में BJP ने 50 सीटें जीतकर खुद को single largest party के रूप में स्थापित किया। मेयर चुनाव में V.V. Rajesh को 51 वोट मिले, जिसमें एक Independent councillor का समर्थन निर्णायक साबित हुआ। यह वही एक वोट था जिसने BJP को मेयर की कुर्सी तक पहुँचाया। यह पूरा घटनाक्रम यह बताता है कि स्थानीय निकायों में अब BJP सिर्फ मौजूद नहीं है, बल्कि power arithmetic समझकर खेल रही है।

क्यों इतना खास है यह मेयर?

V.V. Rajesh का मेयर बनना इसलिए भी अहम है क्योंकि तिरुवनंतपुरम केरल की राजधानी है। राजधानी का नगर निगम केवल civic body नहीं होता, बल्कि वह एक political showcase होता है। यही वजह है कि इसे BJP की केरल में पहली municipal corporation-level victory के रूप में देखा जा रहा है। दशकों से जिस निगम पर Left Front का प्रभाव रहा, वहाँ सत्ता परिवर्तन होना अपने-आप में एक historic moment माना जा रहा है।

क्या यह South India में BJP का पहला वार है?

South India के स्तर पर देखें तो जवाब नहीं है। कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में BJP पहले भी नगर निकायों में सत्ता में रही है। लेकिन केरल के संदर्भ में यह पहली बार है जब पार्टी किसी बड़े नगर निगम में मेयर पद तक पहुँची है। इसलिए यह जीत regional नहीं, state-specific breakthrough मानी जा रही है।

अब तक केरल में BJP कमजोर क्यों थी?

केरल की राजनीति लंबे समय से binary political structure पर टिकी रही है एक तरफ Left Democratic Front और दूसरी तरफ UDF Congress-led United Democratic Front। इस दोध्रुवीय राजनीति में BJP के लिए जगह बनाना आसान नहीं रहा। इसके अलावा, Kerala Legislative Assembly में BJP का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य रहा है, जिसकी वजह से पार्टी को state-level governance exposure नहीं मिल पाया। नतीजा यह रहा कि BJP को अब तक केरल में “विकल्प” की तरह नहीं, बल्कि “बाहरी ताकत” की तरह देखा गया। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि केरल की राज्य सरकार में BJP का एक भी मंत्री नहीं है। मौजूदा मंत्रिमंडल पूरी तरह से Left गठबंधन के नेताओं से बना है। हाँ, केंद्र सरकार में केरल से BJP का प्रतिनिधित्व मौजूद है। सुरेश गोपी वर्तमान में Minister of State for Tourism हैं। इससे पहले V. Muraleedharan भी केंद्र में मंत्री रह चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार में BJP की सीधी भागीदारी अब तक नहीं रही है। यह जीत क्या संकेत देती है? V.V. Rajesh का मेयर बनना यह संकेत देता है कि BJP अब केरल में grassroots politics पर फोकस कर रही है। विधानसभा चुनाव में सीधे बड़ी छलांग लगाने के बजाय पार्टी urban local bodies के जरिए अपनी political legitimacy गढ़ने की कोशिश कर रही है। यह रणनीति long-term political strategy का हिस्सा मानी जा रही है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में BJP का मेयर बनना न तो सत्ता परिवर्तन का अंतिम अध्याय है और न ही महज़ एक संयोग। यह केरल की राजनीति में एक early warning signal है कि पारंपरिक राजनीतिक संतुलन अब पूरी तरह स्थिर नहीं रहा। सवाल अब यह नहीं है कि BJP केरल में आई या नहीं सवाल यह है कि क्या केरल की राजनीति अब तीन-कोणीय की ओर बढ़ रही है?