जब किसी नाबालिग लड़की को इंसाफ पाने के लिए आत्मदाह की कोशिश करनी पड़े, जब पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार कर दे, और जब एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद सिस्टम खामोश रहे तो सवाल सिर्फ एक रेप केस का नहीं रहता, सवाल पूरे Rule of Law पर खड़ा हो जाता है। उत्तर प्रदेश का उन्नाव रेप केस इसी सिस्टम फेलियर का सबसे कड़वा उदाहरण बनकर सामने आया।
तो क्या है उन्नाव रेप केस?
उन्नाव रेप केस की शुरुआत जून 2017 में हुई, जब उन्नाव की एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की ने आरोप लगाया कि तत्कालीन बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने उसे अपने घर बुलाकर उसके साथ rape किया। पीड़िता का कहना था कि अपराध के बाद उसे लगातार धमकियां दी गईं और शिकायत करने पर पूरे परिवार को जान से मारने की बात कही गई। यह मामला सिर्फ sexual assault तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे इसमें criminal conspiracy, abuse of power और obstruction of justice जैसे गंभीर आरोप जुड़ते चले गए।
FIR से लेकर पुलिस कस्टडी डेथ तक: सिस्टम की चुप्पी थी
शिकायत के बावजूद स्थानीय पुलिस ने महीनों तक FIR दर्ज नहीं की। पीड़िता न्याय के लिए दर-दर भटकती रही। इसी दौरान उसके पिता को एक पुराने केस में गिरफ्तार किया गया और कुछ ही समय बाद उनकी police custody में मौत हो गई। बाद में CBI investigation में यह बात सामने आई कि पिता के साथ हिरासत में physical assault किया गया था। यह घटनाक्रम साफ तौर पर दिखाता है कि कैसे सत्ता के दबाव में law enforcement machinery निष्क्रिय हो जाती है। 2019 में जब पीड़िता अपने वकील और चाची के साथ कोर्ट जा रही थी, तब उनकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी। शुरुआत में इसे road accident बताया गया, लेकिन CBI जांच में साफ हुआ कि यह एक planned attack था। इस घटना में पीड़िता की चाची की मौत हो गई, जबकि पीड़िता गंभीर रूप से घायल हो गई। यही वह मोड़ था, जिसने इस केस को राष्ट्रीय स्तर पर एक high-profile criminal case बना दिया।
कौन था आरोपी ?
मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर, उस समय BJP MLA थे। उन पर लगे आरोपों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या political power न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है? मामले के बढ़ते दबाव के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया और उनकी MLA membership भी खत्म हुई। 2019 में Delhi की Special Court ने कुलदीप सिंह सेंगर को Life Imprisonment की सजा सुनाई इसके अलावा उन्हें criminal conspiracy, illegal detention और custodial violence जैसे मामलों में भी दोषी ठहराया गया उन्नाव रेप केस में दोषी ठहराए गए पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को लेकर यह बात अब आंशिक रूप से सच है कि उन्हें जेल से बाहर लाने की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई है, क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा को suspend करते हुए conditional bail दी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे पूरी तरह बरी हो गए हैं या केस खत्म हो गया है यह राहत केवल उनकी appeal pendency के दौरान दी गई है और सजा अब भी कायम है, जिस पर अंतिम फैसला आना बाकी है। कोर्ट ने बेल के साथ कड़ी शर्तें लगाई हैं जैसे survivor के इलाके से दूरी, नियमित reporting और शर्त उल्लंघन पर बेल रद्द होना और इसी कारण कई मामलों में उनकी तत्काल रिहाई भी अटकी हुई है। इस फैसले के बाद देशभर की मीडिया, नागरिक समाज और विपक्ष ने कड़ा सवाल उठाया है कि rape जैसे heinous crime में दोषी पाए गए एक प्रभावशाली नेता को इतनी बड़ी राहत कैसे मिल सकती है, वहीं CBI ने साफ कर दिया है कि वह इस आदेश को Supreme Court में चुनौती देगी। बीजेपी पर सीधे तौर पर अदालत के फैसले को प्रभावित करने का कोई न्यायिक प्रमाण नहीं है, लेकिन आरोप यह लगाए जा रहे हैं कि पार्टी के सत्ता में रहते हुए आरोपी को पहले भी political protection, delayed FIR, police inaction और victim harassment का लाभ मिला, और अब बेल मिलने से survivor की safety, witness protection और institutional trust पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पीड़िता और उसका परिवार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, जबकि समाज और मीडिया इस मामले को इसलिए फिर से केंद्र में ला रहे हैं क्योंकि उन्नाव केस भारतीय criminal justice system का प्रतीक बन चुका है जहाँ सवाल यह नहीं है कि आरोपी को अपील का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या न्याय प्रक्रिया में ताकतवर और कमजोर के लिए एक ही पैमाना सच में लागू होता है या नहीं। उन्नाव रेप केस को लेकर बीजेपी पर यह गंभीर आरोप लगते रहे हैं कि आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर पार्टी का विधायक होने के कारण लंबे समय तक political protection में रहा, जिस वजह से शुरुआत में FIR दर्ज करने में देरी, स्थानीय पुलिस की inaction, और पीड़िता व उसके परिवार पर pressure और intimidation जैसी स्थितियाँ बनीं…विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का यह भी आरोप है कि सत्ता पक्ष ने नैतिक जिम्मेदारी निभाने में देर की और आरोपी के खिलाफ तत्काल और कठोर राजनीतिक कार्रवाई नहीं की, जबकि बाद में बेल मिलने के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या powerful political background न्यायिक प्रक्रिया को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है और क्या ऐसे मामलों में पीड़िता की safety और dignity को सिस्टम वास्तव में सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।
फिर देशभर की मीडिया एकजुट क्यों दिख रही है? उन्नाव केस ने यह सिखाया कि अगर मीडिया और जनता लगातार दबाव न बनाए, तो ऐसे मामलों में justice delayed और justice denied हो सकता है। हाल के समय में बढ़ते sexual violence cases, सोशल मीडिया का दबाव और जनता की नाराज़गी ने मीडिया को फिर से एकजुट किया है। यह एक तरह से collective memory है उन्नाव जैसा केस दोबारा न हो, इसलिए सतर्कता। जनता की प्रतिक्रिया गुस्सा, डर और अविश्वास आज जनता सिर्फ गुस्से में नहीं है, बल्कि institutional trust खोने के डर में है। आखिर ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे कई structural समस्याएं हैं Political interference in policing, धीमी judicial process पीड़ितों की witness protection का अभाव, और समाज की तब तक चुप्पी, जब तक मामला वायरल न हो ।