Zomato के को-फाउंडर और लंबे समय तक CEO रहे दीपिंदर गोयल ने अपने ही बनाए साम्राज्य के CEO पद से हटने का फैसला लिया है। आमतौर पर फाउंडर को ही कंपनी की कमान संभालते देखा जाता है, इसलिए यह सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और यह कैसे संभव है। दरअसल, यह इस्तीफा किसी विवाद, दबाव या असफलता का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा रणनीतिक कदम है, जो आधुनिक कॉरपोरेट दुनिया की बदलती सोच को दिखाता है। दीपिंदर गोयल ने शेयरहोल्डर्स को लिखे अपने पत्र में साफ किया कि एक पब्लिक लिस्टेड कंपनी के CEO के तौर पर रोज़मर्रा के ऑपरेशन, तिमाही नतीजों और निवेशकों की अपेक्षाओं का दबाव इतना बढ़ गया था कि वे उन हाई-रिस्क और लॉन्ग-टर्म इनोवेशन प्रोजेक्ट्स पर काम नहीं कर पा रहे थे, जिनके लिए वे जाने जाते हैं। इसी वजह से उन्होंने CEO पद छोड़कर Vice Chairman की भूमिका चुनी, ताकि वे कंपनी से जुड़े रहकर भी डे-टू-डे मैनेजमेंट से मुक्त होकर “बड़ी सोच” पर फोकस कर सकें। यह समझना जरूरी है कि फाउंडर होना और CEO होना एक ही चीज़ नहीं है। Zomato की शुरुआत 2008 में एक साधारण रेस्टोरेंट-मेनू वेबसाइट के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ यह भारत की सबसे बड़ी फूड-टेक कंपनियों में बदल गई। जैसे-जैसे कंपनी का आकार और जिम्मेदारियां बढ़ीं, वैसे-वैसे मैनेजमेंट स्ट्रक्चर भी प्रोफेशनल होता गया। आज कई ग्लोबल और भारतीय कंपनियों में फाउंडर बोर्ड-लेवल रोल में चले जाते हैं और ऑपरेशनल जिम्मेदारी प्रोफेशनल लीडर को सौंपते हैं दीपिंदर गोयल का फैसला भी इसी ट्रेंड का हिस्सा है। Zomato, जिसे अब Eternal Limited के नाम से जाना जाता है, सिर्फ एक फूड-डिलीवरी ऐप नहीं रह गया है। इसके अंतर्गत Zomato Food Delivery, Blinkit क्विक-कॉमर्स, Hyperpure (रेस्टोरेंट सप्लाई चेन) और District (इवेंट व टिकटिंग) जैसे कई वर्टिकल्स काम कर रहे हैं। खासतौर पर Blinkit ने कंपनी को क्विक-कॉमर्स की दौड़ में नई पहचान दी है, जहां मिनटों में डिलीवरी ही सबसे बड़ा हथियार है। इसी बहु-स्तरीय और तेज़ी से बढ़ते बिजनेस मॉडल ने कंपनी को एक साधारण स्टार्टअप से विशाल कॉरपोरेट में बदल दिया।
CEO पद छोड़ने के बाद दीपिंदर गोयल का अगला फोकस रिसर्च-ड्रिवन, डीप-टेक और हाई-रिस्क इनोवेशन प्रोजेक्ट्स पर होगा ऐसे प्रोजेक्ट्स जो पब्लिक कंपनी के रोज़मर्रा के ढांचे में रहकर करना मुश्किल होता है। Vice Chairman के रूप में वे Eternal के विज़न, संस्कृति और लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी को दिशा देंगे, लेकिन माइक्रो-मैनेजमेंट से दूरी बनाए रखेंगे। संकेत साफ हैं कि वे एक बार फिर उस भूमिका में लौट रहे हैं, जहां वे सबसे ज्यादा सहज हैं एक इनोवेटर और थिंकर के रूप में Zomato–Eternal के लिए यह बदलाव स्थिरता और प्रोफेशनल मैनेजमेंट का संकेत है, जबकि दीपिंदर गोयल के लिए यह आज़ादी है नई सोच, नए प्रयोग और भविष्य की बड़ी छलांग के लिए।
विश्व स्वास्थ्य कूटनीति के इतिहास में एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड आ गया, World Health Organization से United States of America ने औपचारिक रूप से अपने रिश्ते समाप्त कर लिए है। इस फैसले का संकेत तब सामने आया, जब Geneva स्थित WHO के मुख्यालय से अमेरिकी झंडा उतार दिया गया। यह झंडा सिर्फ़ एक देश की मौजूदगी नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व में अमेरिका की दशकों पुरानी भूमिका का प्रतीक था, जो अब इतिहास बन चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें Donald Trump के उस निर्णय में छिपी हैं, जिसे उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए आगे बढ़ाया। ट्रंप प्रशासन का साफ़ आरोप रहा कि WHO ने COVID-19 महामारी के दौरान समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए, महामारी की शुरुआती जानकारी को लेकर पारदर्शिता नहीं दिखाई और संगठन राजनीतिक प्रभावों, खासकर चीन के दबाव में काम करता रहा। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका जैसे बड़े फंडिंग देश के सुझावों और चेतावनियों को WHO ने गंभीरता से नहीं लिया हालाँकि अमेरिका ने WHO की सदस्यता पूरी तरह समाप्त कर दी है, लेकिन तुरंत सभी संपर्क तोड़ने की बजाय उसने एक transitional व्यवस्था अपनाई है। इसके तहत अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह केवल उतने ही सीमित तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग में रहेगा, जितना अलगाव की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए ज़रूरी है। अमेरिका ने यह भी साफ कर दिया है कि वह भविष्य में न तो WHO का observer बनना चाहता है और न ही दोबारा सदस्यता लेने पर विचार करेगा। WHO का दावा है कि अमेरिका पर अब भी करीब 260 से 270 मिलियन डॉलर भारतीय मुद्रा में लगभग ₹2,000 करोड़ से अधिक का बकाया है, जो सदस्यता शुल्क और अन्य योगदानों से जुड़ा हुआ है। अमेरिका ने इस राशि को चुकाने से इनकार कर दिया है, जिससे विवाद और गहरा गया है। यह आर्थिक खींचतान सिर्फ़ पैसों तक सीमित नहीं है, बल्कि WHO की वित्तीय स्थिरता और वैश्विक स्वास्थ्य परियोजनाओं पर इसका सीधा असर पड़ रहा है अमेरिका वर्षों तक WHO का सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है, जो कुल फंडिंग का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा देता था। अमेरिका के बाहर जाने से WHO को अपने कई कार्यक्रमों की समीक्षा करनी पड़ रही है। संगठन के भीतर स्टाफ़ कटौती, बजट में कमी और कुछ स्वास्थ्य अभियानों को सीमित करने की आशंका जताई जा रही है। खासकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों में चल रहे टीकाकरण, महामारी निगरानी और मातृ-स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस फैसले को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवता से जुड़ा संकट मान रहे हैं। उनका कहना है कि महामारी, जलवायु-जनित बीमारियाँ और नई स्वास्थ्य आपदाएँ किसी एक देश की सीमा नहीं मानतीं। ऐसे में अमेरिका जैसे वैज्ञानिक और संसाधन-सम्पन्न देश का WHO से बाहर जाना वैश्विक सहयोग को कमजोर करता है और भविष्य की महामारियों से निपटने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। WHO से अलग होना ट्रंप प्रशासन की व्यापक “America First” नीति का हिस्सा माना जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका अब तक लगभग 70 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समझौतों से खुद को अलग कर चुका है। आलोचकों का कहना है कि यह नीति अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व से अलग-थलग करती है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि इससे अमेरिका अपने संसाधनों और निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण रख पाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फैसला वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को और कमजोर करेगा, या फिर WHO बिना अमेरिका के भी खुद को नए सिरे से संगठित कर पाएगा। जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर गहरी छाप छोड़ने वाला है।