Latest News

Breaking News 23 December 2025

1 ) अरावली को लेकर देशभर में क्यों मचा है हंगामा?

क्या अरावली को तोड़ना विकास है या विनाश की शुरुआत? आइए जानते है पहले की अरावली कैसे बनी थी? अरावली का निर्माण tectonic plate movements के कारण हुआ। जब भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की प्रारंभिक गतिविधियाँ शुरू हुईं, तब यह पर्वत श्रृंखला अस्तित्व में आई। माना जाता है कि अपने शुरुआती दौर में अरावली की ऊँचाई आज के हिमालय के बराबर या उससे भी अधिक थी, लेकिन अरबों वर्षों के कटाव ने इसे धीरे-धीरे घिस दिया। इसका मतलब साफ़ है  अरावली कमज़ोर नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की सबसे ज़्यादा परीक्षित और झेली हुई पर्वत श्रृंखला है। तो अरावली का असली महत्व क्या है? अरावली का महत्व सिर्फ़ भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की ecological backbone है। पहला रेगिस्तान को रोकने की दीवार, अरावली ही वह प्राकृतिक अवरोध है जो थार डेज़र्ट को दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैलने से रोकता है। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि यदि अरावली पूरी तरह नष्ट हुई, तो राजस्थान का रेगिस्तान NCR तक पहुँच सकता है। दूसरा भूजल रिचार्ज सिस्टम, अरावली की चट्टानें वर्षा जल को सोखकर aquifers को रिचार्ज करती हैं। यही वजह है कि अरावली क्षेत्र के आसपास आज भी कई इलाकों में भूजल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अरावली का कटना सीधे-सीधे water crisis को और गहरा करता है। तीसरा है हवा का प्राकृतिक फ़िल्टर, दिल्ली-NCR की जहरीली हवा के बीच अरावली आख़िरी प्राकृतिक फ़िल्टर की तरह काम करती है। यह धूल, गर्म हवाओं और प्रदूषण को काफी हद तक रोकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अरावली के बिना दिल्ली का AQI और भी खतरनाक स्तर पर चला जाएगा। और चौथा है जैव विविधता (Biodiversity) अरावली कोई बंजर पहाड़ नहीं, बल्कि एक जीवित ecosystem है। यहाँ सैकड़ों वनस्पतियाँ और कई वन्य जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनमें तेंदुआ, सियार, नीलगाय जैसे जानवर शामिल हैं। तो फिर अरावली को तोड़ा क्यों जा रहा है? यहीं से कहानी पर्यावरण से निकलकर राजनीति, माफ़िया और क़ानून के जाल में फँस जाती है। पहला कारण है माइनिंग माफ़िया, अरावली क्षेत्र में quartz, marble, granite और building stone जैसे खनिज मौजूद हैं, जिनकी बाज़ार कीमत हज़ारों करोड़ रुपये में है। हरियाणा, राजस्थान और अलवर-फरीदाबाद बेल्ट में वर्षों से illegal mining चलती आ रही है। दूसरा कारण है रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर,  एक्सप्रेसवे, फार्महाउस, लग्ज़री प्रोजेक्ट्स और रिसॉर्ट्स के नाम पर अरावली के जंगल साफ़ किए जा रहे हैं। इसके लिए अक्सर “land use change” और “non-forest land” जैसे शब्दों का सहारा लिया जाता है। तीसरा और सबसे खतरनाक कारण है क़ानूनी हेरफेर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में खनन पर सख़्त रोक लगाई थी। लेकिन इसके बाद कई राज्यों ने पुराने क़ानूनों की व्याख्या बदल दी। कहीं कहा गया कि यह क्षेत्र forest नहीं बल्कि revenue land है, तो कहीं forest की परिभाषा ही बदल दी गई। यानी ज़मीन वही, पहाड़ वही बस नाम बदलकर रास्ता साफ़ कर दिया गया। तो क्या अरावली एक दिन में टूट रही है? नहीं। यही सबसे बड़ा भ्रम है। अरावली को विस्फोट से एक साथ नहीं उड़ाया जा रहा, बल्कि हर साल, हर महीने, हर इंच धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है।
नतीजा हमारे सामने है अचानक आने वाली बाढ़, खतरनाक heatwaves, तेज़ी से गिरता groundwater level, और ऐसी गर्मी जिसमें इंसान का शरीर जवाब देने लगता है। वो अनकहा सच जिसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है अगर अरावली पूरी तरह नष्ट हुई, तो यह सिर्फ़ पर्यावरणीय नुकसान नहीं होगा। यह उत्तर भारत के अस्तित्व का संकट होगा। दिल्ली-NCR जैसे शहर लंबे समय तक रहने लायक नहीं बचेंगे, monsoon pattern बदल जाएगा और रेगिस्तान का फैलाव रोकना नामुमकिन हो जाएगा।
हिमालय हमारी सीमाओं की रक्षा करता है, लेकिन अरावली हमारी हवा, पानी और जीवन की रक्षा करती है। और शायद यही सबसे बड़ा विरोधाभास है  हम जिस पर्वत श्रृंखला पर सबसे कम बात करते हैं, उसी को सबसे ज़्यादा काट रहे हैं।