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Breaking News 22 January 2026

1 ) ईरान सरकार ने जारी किया 3117  मौतों का आंकड़ा : क्या है सच्चाई ?

ईरान सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि देश में हाल ही में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुल 3,117 लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा ईरानी राज्य टीवी, गृह मंत्रालय और Foundation of Martyrs and Veterans Affairs द्वारा जारी किया गया है। सरकार के मुताबिक, इन मृतकों में 2,427 लोगों को शहीद की श्रेणी में रखा गया है, जिनमें आम नागरिकों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल हैं, जबकि शेष 690 लोगों को आतंकवादी या उग्रवादी तत्व बताया गया है। यह पहली बार है जब ईरानी शासन ने इतने बड़े स्तर पर मौतों के आंकड़े को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है, जिससे देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस संकट की गंभीरता और गहराई उजागर होती है। दरअसल, इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में हुई थी, जब महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और सामाजिक स्वतंत्रता पर सख्त पाबंदियों के खिलाफ आम लोग सड़कों पर उतर आए। शुरुआत में ये प्रदर्शन कुछ शहरों तक सीमित थे, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे ईरान में फैल गया। राजधानी तेहरान से लेकर मशहद, इस्फहान, शिराज और तबरीज जैसे बड़े शहरों में लाखों लोग सरकार विरोधी नारे लगाते दिखे। हालात को काबू में करने के लिए सरकार ने सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, इंटरनेट शटडाउन, मीडिया सेंसरशिप और कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए, जिससे देश पूरी तरह एक ‘सूचना ब्लैकआउट’ की स्थिति में चला गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन झड़पों के दौरान हुई मौतों में बड़ी संख्या आम नागरिकों की थी, लेकिन सरकार का दावा है कि मारे गए लोगों में बड़ी संख्या उन तत्वों की भी थी, जो हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल थे। ईरान सरकार ने इन प्रदर्शनों को विदेशी ताकतों द्वारा प्रायोजित साजिश करार दिया है और कहा है कि अमेरिका, इजरायल और कुछ पश्चिमी देश ईरान को अस्थिर करने के लिए इन आंदोलनों को हवा दे रहे हैं। हालांकि, प्रदर्शनकारियों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ये आंदोलन पूरी तरह जनता के गुस्से और वर्षों से जमा असंतोष का परिणाम हैं। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार के इस आंकड़े पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। Human Rights Activists News Agency और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का दावा है कि वास्तविक मौतों की संख्या 4,900 से अधिक हो सकती है। इन संगठनों के अनुसार, कई शवों को गुपचुप तरीके से दफनाया गया, अनेक परिवारों को अपने परिजनों की मौत की सूचना तक नहीं दी गई और कई मामलों में मृतकों की पहचान छिपाने की कोशिश की गई। इंटरनेट और स्वतंत्र मीडिया पर रोक के चलते जमीनी हालात की सटीक जानकारी बाहर आना बेहद मुश्किल रहा, जिससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि वास्तविक आंकड़ा सरकारी दावे से कहीं अधिक हो सकता है। 

इन प्रदर्शनों के दौरान केवल मौतें ही नहीं हुईं, बल्कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें छात्र, महिलाएं, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार वकील तक शामिल हैं। कई रिपोर्ट्स में हिरासत के दौरान यातना, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए हैं। कुछ कैदियों की जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता और आक्रोश को और बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ईरान सरकार के इस क्रैकडाउन की कड़ी निंदा की है। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने स्वतंत्र जांच की मांग की है और ईरान से अपील की है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे। पश्चिमी देशों ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगाने के संकेत भी दिए हैं, जबकि ईरान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप बताया है। ईरान के भीतर स्थिति अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। भले ही सड़कों पर भीड़ कम हुई हो, लेकिन जनता के भीतर असंतोष और गुस्सा अभी भी सुलग रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट केवल एक अस्थायी आंदोलन नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जिस तरह से सरकार ने मौतों का आंकड़ा जारी किया है, वह इस बात का संकेत है कि हालात उसकी सोच से कहीं ज्यादा गंभीर रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 3,117 मौतों का यह आंकड़ा पूरी सच्चाई है, या फिर इसके पीछे छिपी कहानी कहीं ज्यादा डरावनी है?

 

2 ) देशभर में फैले साइबर फ्रॉड रैकेट का पर्दाफाश

देश में तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों के बीच एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए Gujarat Police के Cyber Centre of Excellence ने एक संगठित साइबर फ्रॉड रैकेट का खुलासा किया है। इस कार्रवाई में सूरत से 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने देश के 28 राज्यों में फैले 1,229 से अधिक साइबर ठगी मामलों में अहम भूमिका निभाई और कुल मिलाकर ₹826 करोड़ से ज्यादा की ठगी को अंजाम देने में मदद की। पुलिस जांच के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क Operation Mule Hunt के तहत पकड़ा गया। आरोपियों ने पहचान छिपाने और पैसों की हेराफेरी को आसान बनाने के लिए 9 फर्जी कंपनियों के नाम पर 82 बैंक खाते खुलवाए। इन खातों का इस्तेमाल साइबर अपराधी गैंग्स ठगी से जुटाई गई रकम को इधर-उधर ट्रांसफर करने के लिए करते थे। इन खातों को चलाने वाले लोगों को आमतौर पर म्यूल अकाउंट कहा जाता है, जिनका काम सिर्फ अवैध पैसे को सिस्टम में घुमाना होता है। जांच में सामने आया है कि यह रैकेट लोगों को फर्जी निवेश योजनाओं, ऑनलाइन कमाई के झूठे वादों, नकली जॉब ऑफर, और SMS WhatsApp लिंक के जरिए फंसाता था। जैसे ही पीड़ित पैसे ट्रांसफर करता, वह रकम इन फर्जी खातों में पहुंच जाती और वहां से कई परतों में आगे भेज दी जाती थी। कई मामलों में पैसों को हवाला नेटवर्क के जरिए निकालने के संकेत भी मिले हैं। आरोपियों को हर खाते और ट्रांजैक्शन के बदले कमीशन दिया जाता था। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इस नेटवर्क की जड़ें देशभर में फैली हुई थीं। अलग-अलग राज्यों से लगातार आ रही शिकायतों के डेटा को जब आपस में जोड़ा गया, तब जाकर इस पूरे रैकेट की तस्वीर साफ हुई। बैंक ट्रांजैक्शन, मोबाइल नंबर, सिम कार्ड, डिजिटल लॉग्स और चैट रिकॉर्ड्स को मिलाकर जांच की गई, जिसके बाद सूरत में छापेमारी कर इन आरोपियों को पकड़ा गया। इस कार्रवाई के बाद साफ है कि साइबर अपराध अब सिर्फ तकनीकी ठगी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है, जिसमें फर्जी कंपनियां, बैंकिंग सिस्टम का दुरुपयोग और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का गलत इस्तेमाल शामिल है। पुलिस का कहना है कि जांच अभी जारी है और आने वाले समय में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। साथ ही, जिन बैंक खातों और डिजिटल चैनलों से यह ठगी की गई, उन्हें फ्रीज़ कर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जा रही है। यह मामला एक बार फिर आम लोगों के लिए चेतावनी है कि किसी भी अनजान लिंक, निवेश स्कीम या जल्दी अमीर बनने वाले ऑफर से पहले पूरी सतर्कता बरतना जरूरी है। वहीं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए यह कार्रवाई साइबर अपराध के खिलाफ एक मजबूत संदेश मानी जा रही है कि डिजिटल दुनिया में छिपे अपराधी अब ज्यादा देर तक बच नहीं पाएंगे।