T20 वर्ल्ड कप से शुभमन गिल क्यों हुए बाहर? फॉर्म, टीम कॉम्बिनेशन और सेलेक्शन स्ट्रैटेजी आखिर किस वजह से आइए जानते है… आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 के लिए जैसे ही भारतीय टीम का ऐलान हुआ, सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जिस शुभमन गिल को कुछ समय पहले तक भारतीय क्रिकेट का भविष्य और टी20 टीम का उप-कप्तान माना जा रहा था, वह अचानक वर्ल्ड कप स्क्वाड से बाहर कैसे हो गए? यह फैसला सिर्फ एक नाम हटाने का नहीं था, बल्कि इसके पीछे टीम मैनेजमेंट की पूरी रणनीति, आंकड़े और भविष्य की सोच छुपी हुई है। सबसे पहले यह साफ करना ज़रूरी है कि शुभमन गिल को भारतीय टीम की 15 सदस्यीय वर्ल्ड कप स्क्वाड में शामिल नहीं किया गया। यह फैसला चयन समिति और टीम मैनेजमेंट ने संयुक्त रूप से लिया। चयनकर्ताओं का मानना था कि टी20 जैसे छोटे फॉर्मेट में सिर्फ प्रतिभा नहीं, बल्कि हालिया फॉर्म, स्ट्राइक रेट और मैच इम्पैक्ट सबसे अहम होता है, और इसी पैमाने पर गिल अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए। शुभमन गिल की टी20 इंटरनेशनल फॉर्म लंबे समय से सवालों के घेरे में थी। उन्होंने कई मौकों पर अच्छी शुरुआत जरूर की, लेकिन उसे बड़े स्कोर में बदलने में नाकाम रहे। खास तौर पर पिछले कुछ टी20I मैचों में न तो उनका स्ट्राइक रेट प्रभावशाली रहा और न ही उन्होंने कोई निर्णायक अर्धशतक लगाया। चयन समिति ने स्पष्ट रूप से माना कि गिल का रन-स्कोरिंग पैटर्न टी20 क्रिकेट की तेज़ जरूरतों से मेल नहीं खा रहा था। इसके अलावा, टीम कॉम्बिनेशन इस फैसले की सबसे बड़ी वजह बना। भारतीय टीम मैनेजमेंट इस बार ज्यादा फ्लेक्सिबल और मल्टी-स्किल खिलाड़ियों पर भरोसा करना चाहती थी। इसी रणनीति के तहत टीम में ऐसे बल्लेबाज़ों को प्राथमिकता दी गई जो विकेटकीपिंग और आक्रामक ओपनिंग या मिडिल ऑर्डर रोल निभा सकें। यही कारण है कि ईशान किशन जैसे खिलाड़ी की वापसी हुई, जो एक साथ ओपनर और विकेटकीपर की भूमिका निभा सकते हैं। इस कॉम्बिनेशन में शुभमन गिल फिट नहीं बैठ पाए। एक अहम संकेत यह भी रहा कि शुभमन गिल से उप-कप्तानी की जिम्मेदारी भी वापस ले ली गई। यह साफ दर्शाता है कि टीम मैनेजमेंट अब टी20 फॉर्मेट में एक नए लीडरशिप स्ट्रक्चर पर काम कर रहा है। कप्तानी सूर्यकुमार यादव को सौंपी गई, जबकि उप-कप्तान के तौर पर अक्षर पटेल को चुना गया, जो बल्लेबाज़ी के साथ-साथ गेंदबाज़ी और फील्डिंग में भी टीम को बैलेंस देते हैं। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि शुभमन गिल हाल ही में हल्की फिटनेस और फुट इंजरी से जूझ रहे थे। भले ही यह कोई बड़ी चोट नहीं थी, लेकिन लगातार क्रिकेट और बायो-बबल के दबाव ने उनकी लय को प्रभावित किया। चयनकर्ता किसी भी तरह का रिस्क लेने के मूड में नहीं थे, खासकर वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट से पहले। कुल मिलाकर, शुभमन गिल का बाहर होना किसी एक कारण का नतीजा नहीं था। यह फैसला खराब हालिया फॉर्म, टी20 के हिसाब से कम प्रभाव, टीम कॉम्बिनेशन की मजबूरी, मल्टी-रोल खिलाड़ियों को तरजीह और नई रणनीति इन सभी फैक्टर्स को ध्यान में रखकर लिया गया। चयन समिति का साफ मानना है कि गिल एक बेहतरीन खिलाड़ी हैं, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप 2026 के लिए चुनी गई टीम तत्काल प्रदर्शन और मैच-विनिंग इम्पैक्ट पर आधारित है, न कि भविष्य की संभावनाओं पर।
क्या सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम होता है या फिर वह सत्ता, विचारधारा और राजनीति का सबसे ताक़तवर हथियार बन चुका है? जब Dhurandhar जैसी फिल्म पर यूट्यूबर Dhruv Rathee सवाल उठाते हैं, तो बहस अचानक फिल्म से निकलकर राजनीति, सरकार और फ्री स्पीच तक क्यों पहुँच जाती है? आखिर Dhruv Rathee इतना आक्रामक होकर क्यों बोले, लोग उन्हें झूठा क्यों कह रहे हैं और अब तक उन पर कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई इन सभी सवालों के जवाब इस पूरे विवाद की जड़ में छिपे हैं। Dhruv Rathee ने अपने वीडियो में Dhurandhar फिल्म को लेकर दावा किया कि यह फिल्म केवल एक एक्शन-थ्रिलर नहीं है, बल्कि इसमें एक खास political narrative को मजबूत किया गया है। उनका कहना है कि फिल्म में Nationalism, Intelligence Agencies और State Power को जिस तरह से दर्शाया गया है, वह एक पक्षीय है और अप्रत्यक्ष रूप से मौजूदा सत्ता की छवि को मजबूत करता है। Rathee ने यह भी कहा कि ऐसी फिल्में जनता के मन में एक खास सोच तैयार करती हैं, भले ही उन्हें “fiction” का टैग क्यों न दिया गया हो। Rathee ने निर्देशक आदित्य धर पर भी सवाल उठाए और कहा कि Uri से लेकर Dhurandhar तक उनकी फिल्मों का राजनीतिक टोन लगभग एक-सा रहा है। हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आदित्य धर ने कभी सार्वजनिक रूप से किसी राजनीतिक पार्टी, विशेष रूप से BJP, से जुड़ाव का दावा नहीं किया है। Rathee का यह तर्क एक interpretation है, न कि किसी दस्तावेज़ या आधिकारिक प्रमाण पर आधारित तथ्य। विवाद की सबसे बड़ी वजह फिल्म का वह disclaimer भी बना, जिसमें कहा गया है कि फिल्म आंशिक रूप से काल्पनिक है। Rathee का कहना है कि जब फिल्म में real terrorists, real incidents और real deaths को विस्तार से दिखाया जाता है, तो सिर्फ़ disclaimer देकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। यह तर्क कानूनी तौर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय सिनेमा में यह एक आम लेकिन संवेदनशील loophole माना जाता है।
इस वीडियो के बाद देश दो हिस्सों में बंटता दिखा। एक वर्ग Dhruv Rathee के समर्थन में उतरा और उसने कहा कि सवाल पूछना लोकतंत्र की बुनियाद है। समर्थकों का मानना है कि Rathee गाली या नफरत नहीं फैलाते, बल्कि वह सिनेमा और राजनीति के रिश्ते को उजागर करते हैं और युवाओं को सोचने पर मजबूर करते हैं। उनके अनुसार, अगर लोकप्रिय फिल्मों पर सवाल उठाना गलत है, तो लोकतांत्रिक बहस का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। वहीं दूसरी ओर, Rathee के विरोधियों का कहना है कि उन्होंने बिना किसी ठोस सबूत के फिल्म को “BJP propaganda” कह दिया। आलोचकों का तर्क है कि Rathee खुद एक political influencer हैं और उनकी neutrality संदिग्ध है। उनका आरोप है कि Rathee हर उस फिल्म को शक की नजर से देखते हैं, जो राष्ट्रवाद या सुरक्षा बलों को सकारात्मक रूप में दिखाती है। यहां सबसे जरूरी फर्क समझना है झूठ और opinion में फर्क। Dhruv Rathee ने न तो कोई फर्जी दस्तावेज़ पेश किया, न ही किसी गलत तथ्य को प्रमाण की तरह दिखाया। उन्होंने अपनी बात को “analysis” और “opinion” के रूप में रखा। कानूनी दृष्टि से यह झूठ नहीं, बल्कि एक वैचारिक व्याख्या मानी जाती है। इसी कारण उन पर अब तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है। भारतीय कानून के तहत Freedom of Speech (Article 19(1)(a)) के अंतर्गत किसी फिल्म, सरकार या public figure की आलोचना तब तक अपराध नहीं मानी जाती, जब तक उसमें झूठे तथ्य, दुर्भावनापूर्ण आरोप या व्यक्तिगत मानहानि न हो। चूंकि Rathee ने अपने वीडियो में यह स्पष्ट किया कि यह उनका नजरिया है, इसलिए उनके खिलाफ defamation जैसे मामलों का टिकना कानूनी रूप से मुश्किल है। सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या Dhurandhar वाकई BJP द्वारा बनवाई गई फिल्म है? इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है अब तक ऐसा साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं है। न फंडिंग का सबूत, न सरकारी आदेश और न ही किसी आधिकारिक स्रोत की पुष्टि। इसलिए यह दावा एक allegation है, न कि स्थापित तथ्य। असल में यह पूरा विवाद फिल्म बनाम यूट्यूबर का नहीं, बल्कि Cinema vs Narrative Control की लड़ाई है। एक तरफ फिल्ममेकर कहता है कि यह सिनेमा है, मनोरंजन है, और दूसरी तरफ आलोचक कहते हैं कि सिनेमा कभी innocent नहीं होता, वह समाज की सोच को आकार देता है। Dhurandhar पर मचा बवाल इस बात का संकेत है कि आज भारत में सिनेमा केवल पर्दे तक सीमित नहीं रहा। Dhruv Rathee ने कानूनी सीमा नहीं लांघी, BJP द्वारा फिल्म बनवाने का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, और फिल्म में राजनीतिक संदेश होने या न होने की बहस पूरी तरह वैध है। यह विवाद बताता है कि आज की लड़ाई फिल्म की कहानी से ज्यादा उस सोच पर है, जो दर्शक उसमें पढ़ रहे हैं।
Asian Athletics Championships 2025 में भारत की Jyothi Yarraji ने Women’s 100 metres hurdles में Gold Medal जीतकर इतिहास रच दिया, लेकिन यह जीत जितनी बड़ी थी, उतनी ही खामोशी में दबा दी गई। यह मुकाबला Gumi Civic Stadium, Gumi South Korea में खेला गया, जहां ज्योति ने 12.96 seconds का समय निकालते हुए न सिर्फ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि Competition Record भी बनाया। Jyothi Yarraji कोई अचानक उभरा हुआ नाम नहीं हैं। वह भारत की National Record Holder हैं 100m hurdles में, एशियन लेवल पर लगातार शानदार प्रदर्शन कर चुकी हैं और Asian Games से लेकर Olympic Qualification तक भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इसके बावजूद, जब वह महाद्वीपीय स्तर पर देश के लिए Gold लेकर आती हैं, तो न मीडिया में वैसी गूंज सुनाई देती है, न ही सोशल स्पेस में वैसा उत्साह दिखता है, जैसा किसी फुटबॉल स्टार या क्रिकेट लीग के लिए नजर आता है। सबसे चौंकाने वाली तस्वीर वही थी stadium seats largely empty। इसका मतलब यह नहीं कि South Korea में खेल देखने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि यह बताता है कि track and field events को लेकर global और खासकर Indian audience की प्राथमिकता क्या है। Athletics championships अक्सर multi-event tournaments होती हैं, जहां audience flow event-wise बदलता रहता है। इसके अलावा, limited broadcast promotion, low-key marketing strategy और कम hype भी दर्शक संख्या को प्रभावित करती है। लेकिन असली सवाल भारत से जुड़ा है। जब पूरी सोशल मीडिया timeline किसी European footballer के arrival या friendly match से भर जाती है, तब वही audience यह नहीं पूछती कि India के लिए Asian level पर कौन Gold ला रहा है। Sports consumption pattern in India लंबे समय से skewed रहा है जहां cricket dominates, football stars को celebrity treatment मिलता है, और athletics जैसे Olympic sports सिर्फ medal tally के समय याद आते हैं।
यह विडंबना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि athletics is the backbone of Olympic sports। 100m hurdles जैसे events में medal जीतना सिर्फ personal achievement नहीं होता, यह बताता है कि देश का sports ecosystem, coaching, biomechanics training, nutrition और performance analysis सही दिशा में जा रहे हैं। Jyothi Yarraji की जीत भारत के लिए एक technical and strategic success है, लेकिन narrative बनाने में हम फिर पीछे रह जाते हैं। मीडिया की बात करें तो बड़े हिस्से में athletics की coverage result-based reporting तक सीमित रहती है। ना athlete की journey पर focus होता है, ना उनके technique, split timing, reaction time या hurdle clearance efficiency जैसे technical aspects पर। यही वजह है कि athlete का नाम momentarily headline बनता है, फिर गायब हो जाता है। आज सवाल यह नहीं है कि लोग Messi क्यों देखते हैं। सवाल यह है कि जब India का athlete Asia में Gold जीतता है, तो क्या हम उसे उसी सम्मान, visibility और emotional backing के लायक समझते हैं? खाली स्टेडियम सिर्फ South Korea की तस्वीर नहीं है, वह हमारे sporting priorities का mirror है। अगर हम Olympic sports में global power बनना चाहते हैं, तो applause सिर्फ medal ceremony तक सीमित नहीं रह सकता, उसे audience culture और consistent support में बदलना होगा।