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Breaking News 21 March 2026

1 ) Share Market Crash Pre-planned होता है?

शेयर बाजार के बारे में हमेशा एक narrative चलती है  जैसे मांग और सप्लाई, कंपनी का परफॉर्मेंस, इकॉनमी की ग्रोथ… लेकिन असली सवाल ये है कि क्या सच में मार्केट इतना सीधा है? या फिर ये एक ऐसा खेल है जहाँ सब कुछ दिखता कुछ और है और होता कुछ और है। क्योंकि अगर थोड़ा पीछे जाए तो हर बड़े क्रैश से पहले एक अजीब सा पैटर्न दिखता है। 1992 का Harshad Mehta Scam Crash, 2008 का global meltdown, 2020 का कोविड क्रैश हर बार एक चीज common थी… मार्केट ऊपर था, माहौल पॉजिटिव था, और आम आदमी को लग रहा था कि इस बार तो मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। लेकिन ठीक उसी टाइम, बड़े खिलाड़ी जिन्हें हम smart money कहते हैं धीरे-धीरे मार्केट से निकलना शुरू कर देते हैं। ये exit कोई एक दिन में नहीं होता… ये silently होता है, बिना noise के, बिना panic के। और फिर… एक दिन अचानक कोई news आती है जैसे war, inflation, interest rate, कुछ भी… और मार्केट ऐसे गिरता है जैसे किसी ने switch off कर दिया हो। तब तक retail investor पूरी तरह अंदर फंसा होता है high पर entry, hope पर holding और fear में selling। अब यहाँ असली मामला शुरू होता है तो क्या ये सिर्फ coincidence है? या सच में market में information पहले circulate होती है और news बाद में आती है? क्योंकि data बार-बार यही दिखाता है कि crash से पहले FIIs selling करते हैं, valuations extreme हो जाते हैं, लेकिन narrative वही रहता है India growth story, long term bullish, buy the dip… और retail investor उसी narrative पर भरोसा करके अपना पैसा डालता रहता है। और जब crash आता है, तो वही पैसा किसी और के पास चला जाता है क्योंकि market में loss कभी हवा में नहीं जाता, वो transfer होता है। लेकिन पूरी बात को सिर्फ conspiracy बोल देना भी आसान नहीं है… क्योंकि दूसरी सच्चाई भी उतनी ही brutal है कि market सिर्फ बड़े खिलाड़ियों का नहीं, बल्कि इंसानी psychology का भी खेल है। fear और greed ये दो emotions हर crash में सबसे बड़ा रोल निभाते हैं। लोग high पर इसलिए खरीदते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अभी और ऊपर जाएगा… और low पर इसलिए बेचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अब सब खत्म हो गया। और यही cycle बार-बार repeat होती है। तो असली सवाल ये नहीं है कि market crash planned होता है या नहीं… असली सवाल ये है कि क्या कुछ लोग इस को हमसे पहले समझ जाते हैं? क्या उनके पास better data होता है, faster access होता है, या बस experience होता है? और सबसे important क्या हम हर बार वही गलती करते हैं जो हमें पता भी है कि गलत है? क्योंकि सच थोड़ा uncomfortable है… market कोई charity नहीं है, ये एक battlefield है जहाँ हर trade के पीछे कोई जीतता है और कोई हारता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग rules समझकर आते हैं… और बाकी लोग उम्मीद लेकर।

 

2 ) Political फिल्मों को PROPAGANDA कहना कितना सही?

आज के दौर में एक नया ट्रेंड बन गया है किसी भी फिल्म को समझने से पहले उस पर लेबल चिपका दो। अगर फिल्म आपकी सोच से मेल नहीं खाती, तो वो प्रोपेगैंडा है… और अगर वही चीज़ आपकी सोच को सपोर्ट कर दे, तो वो रियलिटी बन जाती है। इसी कन्फ्यूजन के बीच धुरंधर: द रिवेंज को लेकर भी बहस चल रही है कि क्या ये फिल्म प्रोपेगैंडा है, सिर्फ इसलिए क्योंकि इसमें सरकार के कुछ काम या फैसले दिखाए गए हैं। लेकिन यहाँ सबसे जरूरी बात ये है कि प्रोपेगैंडा शब्द को हम जितना हल्के में इस्तेमाल कर रहे हैं, असल में ये उतना ही गंभीर और टेक्निकल कॉन्सेप्ट है।
प्रोपेगैंडा का मतलब सिर्फ पॉलिटिक्स दिखाना नहीं होता, बल्कि किसी खास सोच या नैरेटिव को इस तरह पेश करना होता है कि दर्शक धीरे-धीरे उसी दिशा में सोचने लगे। यानी फर्क सिर्फ दिखाने और मनवाने में है। अगर कोई फिल्म आपको सिर्फ जानकारी दे रही है, घटनाएं दिखा रही है, या किसी सरकार के कामों को कहानी के हिस्से के रूप में पेश कर रही है तो वो अपने आप में प्रोपेगैंडा नहीं बन जाती। लेकिन अगर वही फिल्म सिर्फ एक ही साइड दिखाए, कोई सवाल ना उठाए, विरोध की कोई जगह ना छोड़े, और भावनाओं को इस तरह इस्तेमाल करे कि आप बिना सोचे एक तय रिजल्ट पर पहुँच जाएं तब वो प्रोपेगैंडा के करीब आती है। अब अगर धुरंधर द रिवेंज की बात करें, तो सिर्फ इस आधार पर कि उसमें सरकार के काम दिखाए गए हैं, उसे प्रोपेगैंडा कहना लॉजिकली गलत है। क्योंकि हर पॉलिटिकल कंटेंट प्रोपेगैंडा नहीं होता। बायोपिक, डॉक्यूमेंट्री, या रियल इवेंट्स पर बनी फिल्में अक्सर किसी खास समय, फैसले या सिस्टम को दिखाती हैं लेकिन उनका मकसद जरूरी नहीं कि आपकी सोच को कंट्रोल करना ही हो। असली सवाल हमेशा इंटेंट का होता है,  क्या फिल्म आपको सोचने दे रही है या आपके लिए सोच रही है? अगर फिल्म आपको स्पेस देती है कि आप खुद डिसाइड करें, तो वो सिनेमा है। अगर वो आपको एक तय दिशा में धकेलती है, तो वो प्रोपेगैंडा बन सकती है।
आज का सबसे बड़ा इश्यू यही है कि ऑडियंस पहले से ही दो हिस्सों में बंटी हुई है। ऐसे में हर कंटेंट को लोग अपने नजरिए से जज करते हैं, ना कि उसके स्ट्रक्चर या इंटेंट से। जो चीज़ अपने खिलाफ जाती है, उसे तुरंत एजेंडा या प्रोपेगैंडा कह दिया जाता है। लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी ज्यादा कॉम्प्लेक्स है। प्रोपेगैंडा एक सोची-समझी स्ट्रैटेजी होती है, जिसमें कहानी से ज्यादा मैसेज मायने रखता है, और मैसेज से ज्यादा उसका असर। ये भी समझिए कि क्या छुपाया गया है, कैसे दिखाया गया है, और सबसे जरूरी क्यों दिखाया गया है। क्योंकि सिनेमा कभी सिर्फ कहानी नहीं सुनाता, वो हमारी सोच को shape भी करता है। और असली समझदारी इसी में है कि हम हर चीज़ को लेबल करने से पहले उसे समझने की कोशिश करें…

 

3 ) नमाज़, नवरात्रि और सख्त नियम… यूपी में आज क्या हो रहा है?

आज ईद-उल-फितर और चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन एक साथ पड़ने के कारण उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर बड़ी तैयारी की गई है, पूरे प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था को हाई अलर्ट पर रखा गया है.... गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर, मेरठ, अलीगढ़, सहारनपुर समेत प्रमुख शहरों में सुबह ईद की नमाज़ शांतिपूर्ण तरीके से तय ईदगाहों और मस्जिदों में अदा की गई। राजधानी लखनऊ के ऐशबाग ईदगाह में बड़ी संख्या में लोग नमाज़ के लिए जुटे, जहां पुलिस और प्रशासन की कड़ी निगरानी के बीच कार्यक्रम संपन्न हो रहा है। इसके साथ ही प्रदेश के अन्य जिलों में भी स्थानीय प्रशासन की निगरानी में नमाज़ कराई गई और भीड़ प्रबंधन के लिए बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन और अतिरिक्त फोर्स की तैनाती की गई है। वहीं दूसरी ओर, चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए अयोध्या, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही है। मंदिरों में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग से पुलिस बल तैनात किया गया है, साथ ही कई स्थानों पर सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों के जरिए निगरानी की गई है। प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया है कि दोनों धार्मिक आयोजनों के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न हो और भीड़ नियंत्रण प्रभावी तरीके से किया जा सके।
प्रदेश सरकार ने इस दिन को देखते हुए पहले ही सभी जिलों को सतर्क कर दिया था। मुख्यमंत्री योगी जी के निर्देश पर पूरे राज्य में पुलिस, PAC और स्थानीय खुफिया तंत्र को सक्रिय रखा गया। संवेदनशील और मिश्रित आबादी वाले इलाकों में विशेष सतर्कता बरती गई, जहां फ्लैग मार्च और लगातार पेट्रोलिंग कराई गई। प्रशासन की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए कि ईद की नमाज़ केवल निर्धारित स्थानों पर ही होगी और सार्वजनिक सड़कों पर नमाज़ की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसी तरह नवरात्रि के जुलूस, पूजा और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों के लिए भी तय नियमों का पालन अनिवार्य किया गया। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए गए, ताकि किसी भी प्रकार की अफवाह या भ्रामक जानकारी को तुरंत रोका जा सके। पुलिस और साइबर सेल को एक्टिव मोड में रखा गया और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ट्रैफिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कई शहरों में रूट डायवर्जन लागू किए गए और प्रमुख धार्मिक स्थलों के आसपास वाहनों की आवाजाही सीमित की गई है, एक ही दिन दो बड़े धार्मिक आयोजनों को देखते हुए उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक स्तर पर सुरक्षा, निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण की व्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत दोनों त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने पर फोकस रखा जा रहा है।