दुनिया की राजनीति इस समय एक असामान्य दौर से गुजर रही है। पिछले एक–डेढ़ साल में अलग-अलग देशों से राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और बड़े मंत्रियों के इस्तीफे सामने आए हैं। यह सिर्फ व्यक्तिगत फैसले नहीं हैं, बल्कि Global Political System में चल रहे गहरे बदलावों का संकेत हैं। इसी कड़ी में हाल ही में बुल्गारिया की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहाँ राष्ट्रपति Rumen Radev के इस्तीफे की खबरों ने पूरे यूरोप का ध्यान खींचा। बुल्गारिया में यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब देश लंबे समय से Political Instability, weak coalition governments और corruption allegations से जूझ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार चुनाव, बार-बार सरकारों का गिरना और अंतरिम सरकारों का बनना इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक राजनीतिक ढाँचा वहाँ काम नहीं कर पा रहा। ऐसे माहौल में राष्ट्रपति का इस्तीफा केवल एक संवैधानिक कदम नहीं, बल्कि एक Strategic Political Move माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, रुमेन राडेव का यह फैसला सत्ता से दूरी नहीं, बल्कि Direct Electoral Politics में उतरने की तैयारी हो सकता है। इस्तीफे के साथ ही नई राजनीतिक पार्टी बनाने के संकेत दिए जा रहे हैं, ताकि वे संसद के भीतर जाकर उस अस्थिरता को नियंत्रित कर सकें, जिसे वे अब तक संवैधानिक पद से केवल manage कर रहे थे। यह ट्रेंड नया नहीं है दुनिया भर में नेता अब symbolic पदों से निकलकर power centers की ओर बढ़ना चाहते हैं। लेकिन सवाल सिर्फ बुल्गारिया तक सीमित नहीं है। Why are so many leaders resigning globally? इसके पीछे कई interconnected कारण हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण है Public Pressure और credibility crisis। डिजिटल युग में सत्ता अब बंद कमरों में नहीं चल सकती। Social Media, Independent Journalism और whistleblower culture ने नेताओं की हर policy और हर निर्णय को public scrutiny में डाल दिया है। नतीजा यह है कि जैसे ही trust deficit बढ़ता है, इस्तीफा एक unavoidable option बन जाता है। दूसरा बड़ा कारण है Coalition Politics का failure। यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका हर जगह fragmented mandates देखने को मिल रहे हैं। Strong single-party governments की जगह unstable alliances ने ले ली है। जब policy paralysis होता है, bills pass नहीं होते और जनता को governance का फायदा नहीं मिलता, तो pressure सबसे ऊपर बैठे व्यक्ति पर आता है और अंत में resignation। तीसरा कारण है Economy-driven politics। Post-pandemic दुनिया में inflation, unemployment, energy crisis और war-related economic stress ने सरकारों की capacity को severely test किया है। जनता अब ideology से ज्यादा delivery और performance देख रही है। जब सरकारें economic expectations पर खरी नहीं उतरतीं, तो leadership change की मांग तेज हो जाती है। एक और अहम पहलू है Politics as a career reboot। कई नेता इस्तीफा इसलिए दे रहे हैं ताकि वे खुद को “failed ruler” के बजाय “alternative hope” के रूप में re-launch कर सकें। नई पार्टी, नया narrative और anti-establishment image यह सब आज की राजनीति का हिस्सा बन चुका है। बुल्गारिया का उदाहरण इसी trend को reflect करता है। इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो साफ है कि यह इस्तीफों की लहर किसी एक देश, एक विचारधारा या एक नेता तक सीमित नहीं है। यह दरअसल Global Democratic Stress Test है, जहाँ पुरानी सत्ता संरचनाएँ नई सामाजिक-आर्थिक realities के सामने टिक नहीं पा रहीं। जनता तेज है, सवाल पूछ रही है, और जवाब न मिलने पर सत्ता से जवाबदेही मांग रही है sometimes in the form of resignation। यह कहा जा सकता है कि दुनिया इस समय Transition Phase में है। जो नेता इस बदलाव को समझकर खुद को adapt कर रहे हैं, वे नई राजनीति गढ़ रहे हैं। और जो नहीं कर पा रहे, वे या तो इस्तीफा दे रहे हैं या इतिहास में दर्ज हो रहे हैं। बुल्गारिया की घटना इसी बड़े वैश्विक राजनीतिक बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं।
रात के अंधेरे में अगर कोई नागरिक अपने ही शहर में सुरक्षित घर नहीं पहुँच सकता, अगर सड़क पर चलती गाड़ी अचानक ज़मीन निगल लेती है, और अगर एक युवा 90 मिनट तक ज़िंदा रहते हुए मदद के लिए फोन करता रहे लेकिन सिस्टम उसे निकाल न पाए तो सवाल किसी हादसे का नहीं, पूरे प्रशासनिक ढांचे की विफलता का है। युवराज मेहता की मौत कोई दुर्घटना तो नहीं है इसे पूरी तरह सिस्टम फेलियर कहेंगे.. और मौत के बाद स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन हुआ लेकिन इससे होगा ....युवराज के पिता को इससे क्या फायदा होगा...क्योंकि जिंदा रहते हुए भी प्रशासन बचा नहीं पाई । 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता रात के समय गुरुग्राम से नोएडा की ओर लौट रहे थे। सेक्टर-150, Greater Noida क्षेत्र में उनकी SUV अचानक सड़क किनारे बने एक गहरे, पानी से भरे गड्ढे में गिर गई। यह कोई छोटा गड्ढा नहीं था रिपोर्ट्स के मुताबिक यह 20 से 40 फीट गहरा था और अंदर भारी मात्रा में पानी भरा हुआ था।
हादसे के तुरंत बाद युवराज ने अपने पिता को फोन किया। उन्होंने बताया कि वह ज़िंदा हैं, गाड़ी में फँसे हैं और बाहर निकल नहीं पा रहे। मोबाइल की टॉर्च जलाकर उन्होंने लोकेशन दिखाने की कोशिश की। यानी rescue window मौजूद थी । स्थानीय लोग पहुँचे। एक डिलीवरी बॉय भी नीचे उतरने की कोशिश करता है, लेकिन गहराई और पानी की वजह से असफल रहता है। ....सूचना पुलिस, फायर ब्रिगेड और प्रशासन तक पहुँचती है। बाद में NDRF की टीम आती है। लेकिन सवाल यह है कि जब एक व्यक्ति ज़िंदा है, कॉल पर है, लोकेशन स्पष्ट है, तब rapid water rescue, extraction equipment, या trained रेस्क्यू टीम तुरंत क्यों उपलब्ध नहीं थे? क्यों निकाल नहीं पाए हालांकि बाद में बहुत देर हो चुकी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार युवराज की मौत का कारण stress hypothermia बताया गया। सीधे शब्दों में वह धीरे-धीरे डूबते रहे, ठंडे पानी और डर ने शरीर जवाब दे दिया। यह मौत अचानक नहीं थी। यह मौत धीरे-धीरे सिस्टम के सामने हुई। अब बड़ा सवाल यह गड्ढा था किसका? जिस गड्ढे में युवराज की गाड़ी गिरी, वह किसी निर्माण परियोजना से जुड़ा था। रिपोर्ट्स के अनुसार यह जमीन एक private real-estate developer के नियंत्रण में थी। ना बैरिकेडिंग थी, ना reflective warning signs, ना night illumination, ना कोई danger वाला बोर्ड ताकि कोई वहां ना जाए.... यानि basic site safety का खुला उल्लंघन। इसी मामले में एक बिल्डर की गिरफ्तारी हुई है और Special Investigation Team का गठन किया गया है। लेकिन प्रशासन कहाँ था? यहीं से असली सवाल शुरू होते हैं Sub-Divisional Magistrate का दायित्व क्षेत्र में अवैध या खतरनाक निर्माण की निगरानी public safety hazards पर तत्काल कार्रवाई site sealing या work stoppage orders
अगर गड्ढा महीनों से मौजूद था, तो SDM को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी? DM की जिम्मेदारी inter-departmental coordination ..disaster preparedness...emergency response infrastructure होती है लेकिन किसी ने कुछ नहींकिया ....हालांकि मौत के बाद सब गठन हुआ पर उसके पिता को इससे क्या फायदा बेटा तो चला गया तो क्या जिले में deep-water rescue के लिए पर्याप्त resources मौजूद थे? अगर नहीं, तो यह administrative failure नहीं तो क्या है? ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी road safety audit....drainage and waterlogging management ...construction approvals और monitoring कहा है आखिर...2015 और 2023 में इसी क्षेत्र में पानी भराव को लेकर विभागीय नोटिस मौजूद थे। अगर खतरे पहले से ज्ञात थे, तो action क्यों नहीं लिया गया? एक व्यक्ति ज़िंदा था और संपर्क में था, तब rescue ऑपरेशन सफल क्यों नहीं हुआ? यह सिर्फ एक मौत नहीं है युवराज मेहता की मौत ने यह साफ कर दिया है कि हमारे शहरों में आपदा आने पर हर विभाग जिम्मेदारी दूसरे पर डाल देता है अगर यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल न होता, तो शायद यह भी “एक और हादसा” बनकर फाइलों में दब जाता। अब सवाल सीधा है क्या किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी? क्या सिर्फ बिल्डर की गिरफ्तारी काफी है? क्या भविष्य में ऐसे गड्ढों की mapping और audit होगी? और सबसे ज़रूरी क्या अगला युवराज बच पाएगा? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मानना पड़ेगा कि यह मौत एक आदमी की नहीं, प्रशासनिक सिस्टम की नैतिक हार है। युवराज मेहता की मौत ने प्रशासनिक जवाबदेही पर जो सवाल खड़े किए, उनके जवाब अब भी ग़ायब हैं ।
अंतरिक्ष की खामोशी में, जहाँ गुरुत्वाकर्षण नहीं होता, वहाँ कुछ नाम ऐसे होते हैं जो धरती पर भी वजन रखते हैं। Sunita Williams उन्हीं नामों में से एक हैं। हाल के दिनों में जब “सुनीता विलियम्स की विदाई” की खबरें सामने आईं, तो बहुत-से सवाल उठे क्या कोई हादसा हुआ? क्या उन्होंने NASA छोड़ दिया? या क्या यह किसी विवाद का नतीजा है? सच इससे बिल्कुल अलग, और कहीं ज़्यादा गरिमामय है। सुनीता विलियम्स की यह विदाई किसी अचानक फैसले या मजबूरी की कहानी नहीं है, बल्कि दशकों की सेवा के बाद एक स्वाभाविक और योजनाबद्ध प्रोफेशनल ट्रांज़िशन है। NASA में यह सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है कि लंबे समय तक सक्रिय मिशनों का हिस्सा रहे वरिष्ठ अंतरिक्ष यात्री धीरे-धीरे फ्लाइंग रोल से हटकर ट्रेनिंग, रिसर्च और मेंटरशिप जैसे ज़िम्मेदारियों की ओर बढ़ते हैं। यानी, सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष से दूर नहीं हुईं बस उनकी भूमिका बदल गई है। 19 सितंबर 1965 को जन्मीं सुनीता विलियम्स ने 1998 में NASA Astronaut Corps जॉइन किया। इसके बाद शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने उन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिला वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की कतार में खड़ा कर दिया। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन 2006-07 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए था, जहाँ उन्होंने करीब 195 दिन बिताए उस समय यह किसी महिला द्वारा अंतरिक्ष में बिताया गया सबसे लंबा समय था। 2012 में उनका दूसरा मिशन और भी ऐतिहासिक साबित हुआ। इसी दौरान वे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की कमांडर बनीं यह पद हासिल करने वाली दुनिया की चुनिंदा महिलाओं में से एक। इस भूमिका में उन्होंने न सिर्फ वैज्ञानिक प्रयोगों की अगुवाई की, बल्कि यह भी साबित किया कि अंतरिक्ष नेतृत्व में gender नहीं, योग्यता मायने रखती है। सुनीता विलियम्स का नाम स्पेसवॉक के इतिहास में भी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने कुल 7 स्पेसवॉक किए, जिनका समय 50 घंटे 40 मिनट रहा। एक समय तक यह रिकॉर्ड किसी भी महिला अंतरिक्ष यात्री द्वारा किया गया सबसे लंबा स्पेसवॉक टाइम था। यह आँकड़े सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, बल्कि उसशारीरिक-मानसिक साहस का प्रमाण हैं जिसकी कल्पना भी ज़मीन पर रहकर मुश्किल है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो उनका योगदान बेहद अहम रहा। माइक्रोग्रैविटी में मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव, हड्डियों की मजबूती, मांसपेशियों के क्षय, स्पेस मेडिसिन और पृथ्वी की जलवायु से जुड़े कई प्रयोगों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इन शोधों का फायदा आज न सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों को मिल रहा है, बल्कि धरती पर मेडिकल साइंस को भी नई दिशा मिली है। सुनीता विलियम्स का भारत से रिश्ता सिर्फ भावनात्मक नहीं, प्रेरणात्मक भी है। भारतीय मूल की होने के कारण उन्होंने कई बार अंतरिक्ष से भारतीय तिरंगे को सलाम किया, भारत आकर छात्रों से संवाद किया और विज्ञान को सपने से हकीकत में बदलने की प्रेरणा दी। भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना इसी योगदान की स्वीकृति है। अब जब वह सक्रिय अंतरिक्ष उड़ानों से पीछे हटी हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उनका मिशन खत्म हो गया है। आज वे नई पीढ़ी के अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेन कर रही हैं, मिशन प्लानिंग और स्पेस रिसर्च से जुड़े निर्णयों में सलाह दे रही हैं। सरल शब्दों में कहें तो वे अब भी NASA का हिस्सा हैं, बस कॉकपिट की जगह कंट्रोल रूम और क्लासरूम में