भारत में हो रहे AI समिट से एक नाम ऐसे घूम रहा है जैसे गली क्रिकेट में आख़िरी ओवर हो....नाम है Sarvam AI। 2023 में स्थापित यह भारतीय स्टार्टअप, जिसकी स्थापना Vivek Raghavan और Pratyush Kumar ने की, अब 22 भारतीय भाषाओं में AI मॉडल तैयार करने के दावे के साथ सुर्खियों में है। सोशल मीडिया से लेकर टेक मीडिया तक हर जगह यही सवाल क्या भारत ने अपना ChatGPT बना लिया? Sarvam AI का दावा है कि उसके Large Language Models 22 भारतीय भाषाओं में टेक्स्ट और वॉइस इंटरैक्शन, ट्रांसलेशन और लोकल-कॉन्टेक्स्ट समझने की क्षमता रखते हैं। यानी अगर कोई भोजपुरी में बोले, तमिल में पूछे या कन्नड़ में आदेश दे तो सिस्टम जवाब दे सके। यही 22 भाषाओं में लाइव ट्रांसलेट वाली लाइन वायरल हुई। लेकिन यहाँ एक जरूरी नोट भी है कंपनी ने multilingual capability दिखाई है, पर स्वतंत्र global benchmarks या peer-reviewed comparison अभी सार्वजनिक नहीं हैं। यानी तकनीक मौजूद है, लेकिन दुनिया से आगे वाला टैग अभी डेटा के इंतज़ार में है। Summit में Sarvam AI को India-centric AI मॉडल के रूप में पेश किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी ने लगभग 41 मिलियन डॉलर की शुरुआती फंडिंग जुटाई है और इसका फोकस है AI को भारतीय संदर्भों में ढालना, सिर्फ अंग्रेज़ी-केंद्रित मॉडल नहीं। यही कारण है कि जब वैश्विक टेक चर्चाओं में भारतीय भाषाओं की बात उठी तो Sarvam AI अचानक सुर्खियों में आ गया। सोशल मीडिया पर चर्चा की दूसरी वजह भावनात्मक है Make in India AI का नैरेटिव। जब लोग देखते हैं कि कोई भारतीय स्टार्टअप बहुभाषी AI बना रहा है, तो बात सिर्फ टेक्नोलॉजी की नहीं रहती, गर्व की हो जाती है। अब सवाल क्या यह सच में ChatGPT या Gemini को टक्कर दे रहा है? जवाब थोड़ा संतुलित है। Sarvam AI का फोकस खास तौर पर भारतीय भाषाओं और लोकल डोमेन पर है, जबकि वैश्विक मॉडल multi-domain और multi-country scale पर काम करते हैं। इसलिए तुलना सीधी नहीं, संदर्भ-आधारित है।
India AI Impact Summit में मंच पर आत्मनिर्भर AI की बातें हो रही थीं, भाषणों में न्यू इंडिया के एल्गोरिद्म दौड़ रहे थे, और स्टॉल्स पर भविष्य चमक रहा था। तभी एक चार पैरों वाला रोबोट-डॉग Orion नाम से एंट्री मारता है। बताया गया कि ये हमारा इनोवेशन है, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की मेहनत है, छात्रों की रिसर्च है। कैमरे घूमे, माइक आगे बढ़े, और कुछ मिनटों के लिए लगा कि भारत का अगला बोस्टन डायनामिक्स यहीं से निकलने वाला है। लेकिन टेक कम्युनिटी की नजरें एक्स-रे से कम नहीं होतीं। सोशल मीडिया पर वीडियो चढ़ा और पहचान हो गई अरे ये तो Unitree Robotics का कमर्शियल मॉडल है, जो ग्लोबल मार्केट में बिकता है। बस, मामला यहीं से तुक पकड़ने लगा । वायरल क्लिप में रोबोडॉग की खूबियां गिनाई जा रही थीं, और अंदाज़ ऐसा जैसे ये पूरी तरह घरेलू उत्पाद हो। सवाल उठा क्या यह इन-हाउस डेवलपमेंट था या इम्पोर्टेड डेमो? क्या यह छात्रों के लिए लर्निंग टूल था या ब्रांडिंग का शो-पीस? टेक एक्सपर्ट्स ने मॉडल तक पहचान लिया Go2/Go सीरीज़ जैसा डिजाइन, वही मूवमेंट, वही स्पेसिफिकेशन। कुछ ही घंटों में डिजिटल अदालत लग गई। हैशटैग चले, मीम बने, और AI Summit का ट्रेंड RoboDog Row में बदल गया। आयोजकों ने सख्ती दिखाई स्टॉल का पावर कट, और एक्सपो से बाहर का रास्ता। यह कदम सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, प्रतीकात्मक भी था कि इनोवेशन की प्रदर्शनी में इमिटेशन की जगह सीमित है। मामला राज्य की राजनीति तक जा पहुँचा। जांच, जवाबदेही, और निजी विश्वविद्यालयों की मार्केटिंग प्रथाओं पर बहस शुरू हो गई। विश्वविद्यालय ने सफाई दी हमने इसे पूरी तरह अपना बनाया हुआ नहीं कहा, यह तो hands-on learning के लिए था। लेकिन सवाल फिर भी तैरता रहा अगर यह केवल लर्निंग टूल था, तो प्रस्तुति का लहजा स्टार्ट-अप पिच जैसा क्यों था? यह विवाद सिर्फ एक रोबोट-डॉग का नहीं था। यह उस रेखा का था जो प्रदर्शन और दावा के बीच खिंची होती है। AI के इस युग में जहां मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगी हैं, वहीं इंसान कभी-कभी मशीनों की तरह पैकेजिंग करने लगते हैं डेटा असली हो या न हो, प्रेज़ेंटेशन पॉलिश्ड होना चाहिए। पर टेक की दुनिया में सच्चाई का कोड ओपन-सोर्स होता है, देर-सवेर पढ़ लिया जाता है। इस प्रकरण ने तीन बड़े सवाल खड़े किए। पहला क्या हम इनोवेशन की दौड़ में नैतिकता का फायरवॉल मजबूत रख पा रहे हैं? दूसरा क्या विश्वविद्यालय अब रिसर्च सेंटर कम और मार्केटिंग हब ज्यादा बनते जा रहे हैं? और तीसरा क्या ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के दौर में ‘आर्टिफिशियल इम्प्रेशन’ बनाना आसान हो गया है? रोबोडॉग चार पैरों पर खड़ा था, मगर विवाद ने कई लोगों को दो पैरों पर संतुलन साधने पर मजबूर कर दिया। AI समिट का मंच भविष्य दिखाने के लिए था, पर इस घटना ने वर्तमान का आईना सामने रख दिया जहाँ ब्रांडिंग और बौद्धिक ईमानदारी की जंग जारी है। और सबक सीधा है टेक्नोलॉजी में शॉर्टकट हो सकता है, भरोसे में नहीं।