क्या आज के दौर में YouTube वीडियो, Instagram Reel या Facebook पोस्ट सिर्फ़ एंटरटेनमेंट हैं? या फिर ये लाखों युवाओं की livelihood, उनकी digital property और उनका sole source of income बन चुके हैं? और अगर यही सच है, तो फिर algorithm-driven copyright strikes के ज़रिए किसी क्रिएटर की पूरी कमाई और पहचान मिनटों में क्यों मिटा दी जाती है? यही सवाल AAP सांसद राघव चड्ढा ने राज्यसभा के Zero Hour में उठाया और यही सवाल आज की Creator Economy की सबसे बड़ी सच्चाई भी है। राघव चड्ढा ने संसद के भीतर साफ़ शब्दों में कहा कि आज भारत में Digital Content Creation कोई शौक नहीं, बल्कि एक full-time profession बन चुका है। देश में लाखों लोग educational content, film reviews, satire, political commentary, news analysis और entertainment के ज़रिए digital platforms से कमाई कर रहे हैं। उनके मुताबिक आज एक YouTube चैनल या Instagram पेज सिर्फ़ अकाउंट नहीं, बल्कि creator की मेहनत, समय और भविष्य की कमाई का आधार है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी वीडियो में 2–3 सेकंड का background audio, किसी फिल्म या न्यूज़ क्लिप का commentary या criticism के लिए इस्तेमाल, या फिर satire, parody या educational reference को सीधे piracy मान लिया जाता है और बिना चेतावनी के copyright strike या takedown कर दिया जाता है। राघव चड्ढा का साफ़ कहना था “Fair use piracy नहीं है, और किसी इंसान की livelihood का फैसला algorithms के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।” असल चिंता इस बात को लेकर है कि आज copyright enforcement का बड़ा हिस्सा automated systems और opaque platform policies के ज़रिए होता है। कई मामलों में creator को यह तक नहीं बताया जाता कि strike किस आधार पर लगी, content क्यों हटाया गया और क्या उसका इस्तेमाल transformative nature का था या नहीं। नतीजा यह होता है कि सालों में बना चैनल एक झटके में demonetise हो जाता है, brand deals खत्म हो जाती हैं और audience reach पूरी तरह टूट जाती है। यानी एक algorithmic decision किसी इंसान के पूरे digital career को collapse कर देता है। इसी सिस्टम को राघव चड्ढा ने arbitrary और one-sided बताया। उनका तर्क था कि platforms के पास ताक़त है, लेकिन creators के पास सुरक्षा नहीं। जहां एक तरफ़ सरकार Startup India और Digital India की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ़ creators डर के माहौल में काम करने को मजबूर हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता अगली strike कब उनका सब कुछ छीन लेगी। कानूनी स्तर पर भारत में Copyright Act, 1957 मौजूद है और उसके Section 52 में Fair Dealing के प्रावधान भी दिए गए हैं, जिनमें criticism, review और reporting of current events जैसे exceptions शामिल हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि यह कानून pre-digital era में बना था। इसमें ना तो social media platforms की working को ध्यान में रखा गया है और ना ही algorithm-based enforcement को। आज के digital ecosystem में “कितना हिस्सा fair है”, “commercial content में fair dealing कैसे तय होगी” और “background या incidental use को कैसे देखा जाए” इन सवालों के स्पष्ट जवाब कानून में नहीं मिलते। यही वजह है कि platforms अपने internal policies और global guidelines के आधार पर कार्रवाई करते हैं, और creators कानूनी अनिश्चितता में फँस जाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि content कानून के हिसाब से fair dealing के दायरे में आता है, लेकिन platform policy उसे violation मान लेती है। इस gap की तरफ़ राघव चड्ढा ने संसद का ध्यान खींचा। राघव चड्ढा ने सिर्फ़ समस्या नहीं गिनाई, बल्कि policy-level solutions भी रखे। उन्होंने मांग की कि Copyright Act में amendment करके digital fair use या digital fair dealing को स्पष्ट रूप से define किया जाए, ताकि commentary, satire, education और incidental use को piracy न माना जाए। उन्होंने proportionality principle की बात भी की यानि अगर violation मामूली है, तो पूरा चैनल हटाना या कमाई बंद करना एक disproportionate punishment है। इसके साथ ही उन्होंने mandatory due process की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उनका कहना था कि content हटाने से पहले creator को notice, clear reasoning और appeal का fair मौका मिलना चाहिए। राघव चड्ढा के शब्दों में, “Innovation डर के माहौल में नहीं पनपता, और creator economy को डर के सहारे नहीं चलाया जा सकता।” हालांकि पत्रकारिता के नज़रिए से देखा जाए तो उनकी बात भावनात्मक और सामाजिक रूप से मजबूत है, लेकिन कानूनी तौर पर पूरी तरह absolute नहीं। यह सच है कि हर copyrighted content का इस्तेमाल fair नहीं होता। Commercial exploitation, excessive usage और market harm जैसे factors भी देखे जाते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि आज genuine creators को अक्सर piracy और fair use के बीच के फर्क की कीमत चुकानी पड़ती है। राघव चड्ढा का यह मुद्दा असल में सिर्फ़ copyright का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या भारत की digital economy में creators को सिर्फ़ users की तरह देखा जाएगा या professionals की तरह। जब कंटेंट क्रिएशन रोज़गार है, तो उसे कानून और नीति दोनों स्तर पर सुरक्षा मिलनी ही चाहिए। संसद में उठा यह सवाल आने वाले समय में creator economy और copyright law के बीच की सबसे अहम बहस बन सकता है।