क्या राजधानी की Water Crisis किसी एक सरकार की नाकामी है, या यह उस सिस्टम की विफलता है जहाँ जवाबदेही हमेशा दूसरे के पाले में डाल दी जाती है? अगर Water Treatment Plant समय पर बनते, Sewage Treatment Plant पूरी क्षमता से चलते और Yamuna Pollution Control सिर्फ फाइलों तक सीमित न रहता, तो क्या आज दिल्ली को पानी और प्रदूषण दोनों के लिए संघर्ष करना पड़ता? यही सवाल तब खड़े होते हैं जब BJP नेता प्रवेश वर्मा कहते हैं कि “दिल्ली में Water Treatment Plant जैसे सारे काम AAP सरकार को करना चाहिए था।” दिल्ली में पानी और सीवेज से जुड़ा मसला नया नहीं है। यह एक long-term infrastructure issue है, जो कई सरकारों के कार्यकाल से गुजरता हुआ आज भी अधूरा खड़ा है। प्रवेश वर्मा का बयान सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी की पिछली सरकारों पर आरोप लगाता है कि उन्होंने Water Treatment Infrastructure, Sewage Management और Drinking Water Supply को लेकर अपेक्षित काम नहीं किया। यह बयान राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन पत्रकारिता की कसौटी पर इसे केवल आरोप के रूप में ही देखा जा सकता है, न कि पूर्ण सत्य के रूप में।
तथ्य यह है कि दिल्ली में Delhi Jal Board के तहत Water Treatment Plants और Sewage Treatment Plants पहले से मौजूद हैं। AAP सरकार के कार्यकाल में Pipeline Expansion, Unauthorized Colonies में Water Supply, और Yamuna Cleaning Projects को लेकर योजनाएँ बनाई गईं और कई जगह काम भी शुरू हुआ। हालांकि, यह भी सच है कि Execution Delay, Capacity Utilisation और Maintenance Failures की वजह से इन योजनाओं का असर ज़मीन पर उतना नहीं दिखा, जितना कागज़ों में बताया गया। प्रवेश वर्मा का बयान केवल प्रशासनिक आलोचना नहीं, बल्कि एक political narrative भी है। BJP और AAP के बीच दिल्ली मॉडल को लेकर लंबे समय से टकराव रहा है जहाँ AAP खुद को Education और Health मॉडल से जोड़ती है, वहीं BJP बुनियादी ढांचे, Pollution और Water Management को कमजोर कड़ी बताती रही है। ऐसे में Water Treatment Plant पर दिया गया बयान आने वाले राजनीतिक समीकरणों और Public Perception को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा सकता है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि दोष किसका है। असली सवाल यह है कि क्या आज की सरकार सिर्फ पिछली सरकार की कमियाँ गिनाकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है? Governance का सिद्धांत साफ है जब सत्ता मिलती है, तो विरासत में मिली समस्याओं को सुधारना भी उसी का हिस्सा होता है। Blame Game से Political Debate तो तेज होता है, लेकिन Water Quality, Groundwater Level और River Pollution जैसे Technical Issues का समाधान नहीं निकलता। Water Treatment Plant, Sewage Network, Drainage System और Environmental Clearance जैसे Technical Domains में काम करने के लिए Inter-Governmental Coordination, Long-Term Planning और Transparent Monitoring जरूरी होती है। दिल्ली जैसे शहर में, जहाँ State Government, Central Government और Local Bodies के अधिकार आपस में टकराते हैं, वहाँ एक-दूसरे पर काम थोपना प्रशासनिक समाधान नहीं हो सकता। प्रवेश वर्मा का बयान राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से यह Partial Truth को दर्शाता है, Complete Reality को नहीं। AAP सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है कि वह आरोपों से आगे बढ़कर Execution, Accountability और Results दिखाए। दिल्ली को बयान नहीं, Clean Water, Functional Treatment Plants और Sustainable Water Management System चाहिए और यह तभी संभव है, जब राजनीति से ऊपर उठकर शासन किया जाए।
क्या 100 Metre की परिभाषा से भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला खतरे में है? क्या भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला Aravalli अब “काग़ज़ी परिभाषा” में सिमट जाएगी? क्या 100 metre का technical benchmark किसी geological heritage को बचाने के लिए पर्याप्त है? और अगर अरावली कमजोर हुई, तो क्या Delhi–NCR को उसकी कीमत हवा, पानी और गर्मी के रूप में चुकानी पड़ेगी? Supreme Court के हालिया आदेश के बाद ये सवाल सिर्फ environmental activists ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुके हैं। Aravalli Range दुनिया की सबसे पुरानी fold mountain systems में से एक मानी जाती है, जिसकी उम्र लगभग 3.2 billion years आँकी जाती है यानी यह Himalayas से भी कहीं पुरानी है। यह पर्वतमाला Gujarat से लेकर Rajasthan, Haryana और Delhi तक फैली हुई है और इसे अक्सर “green wall against desertification” कहा जाता है। अरावली का ecological role सिर्फ पहाड़ तक सीमित नहीं है। यह Dust barrier की तरह Thar Desert की रेत को Delhi–NCR तक आने से रोकती है, Groundwater recharge zone का काम करती है और Microclimate regulation और biodiversity conservation में अहम भूमिका निभाती है। Supreme Court ने हाल ही में Ministry of Environment, Forest and Climate Change की एक expert committee की recommendations को स्वीकार किया है। इसमें Aravalli को operationally define करने की कोशिश की गई, खासकर mining regulation के संदर्भ में। Court के अनुसार, Aravalli Hill वही landform मानी जाएगी जिसकी local relief 100 metres हो। यह measurement lowest contour line से की जाएगी। दो या अधिक hills अगर 500 metres proximity में हों, तो उन्हें Aravalli Range माना जाएगा। Court ने यह भी माना कि Aravalli ecologically fragile है, लेकिन एक uniform, workable definition की जरूरत बताई। यहीं से असली विवाद शुरू होता है। Environmental experts का कहना है कि Aravalli एक high-elevation mountain system नहीं, बल्कि ancient, eroded hills की श्रृंखला है। सदियों की erosion के कारण इसकी कई ridges आज 100 metre से कम ऊँची हैं लेकिन ecological importance कम नहीं हुई। Critics का तर्क है कि height-based definition से large portion of Aravalli landscape legal protection से बाहर हो सकता है, इससे mining, stone crushing और real estate activities को रास्ता मिल सकता है और ecological continuity टूटने का खतरा है। यानी पहाड़ जमीन पर तो रहेगा, लेकिन कानून की नजर में “पहाड़” नहीं रहेगा। सीधा जवाब यह है कि नहीं, Supreme Court ने Aravalli काटने या हटाने का कोई सीधा आदेश नहीं दिया है। लेकिन पूरा सच यह है कि Court ने blanket ban on existing legal mining नहीं लगाया, साथ ही new mining leases या renewals को लेकर scientific scrutiny की बात कही और Indian Council of Forestry Research and Education को Management Plan for Sustainable Mining तैयार करने का निर्देश दिया गया। यानी खतरा immediate demolition का नहीं, बल्कि policy-level dilution का है। यह आदेश judicial domain से आया है, इसलिए केंद्र सरकार सीधे राजनीतिक बयान देने से बचती दिख रही है। Implementation अब MoEF&CC, state governments और scientific institutions के हाथ में है। हालाँकि critics का मानना है कि इतनी बड़ी ecological concern पर clear public communication की कमी है और transparency और mapping process को लेकर भरोसा कमजोर है, लेकिन यह कहना कि “सरकार जानबूझकर चुप है” बिना official statement के पूरी तरह factual नहीं कहा जा सकता। Delhi–NCR के लिए Aravalli सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि life-support system है। Aravalli desert dust को रोकने में natural barrier का काम करती है और mining या vegetation loss से particulate matter (PM10, PM2.5) बढ़ने का खतरा है। Aravalli की fractured rocks और forest cover aquifer recharge में मदद करते हैं और damage होने पर Delhi की already stressed water table और नीचे जा सकती है। Green cover loss से urban heat island effect और extreme temperatures बढ़ सकते हैं। Asola Bhatti जैसे protected patches wildlife corridors हैं और fragmentation से ecological balance बिगड़ सकता है। Aravalli को लेकर मुद्दा यह नहीं है कि “पहाड़ आज कटेगा या नहीं”, बल्कि यह है कि क्या कानून की परिभाषा प्रकृति की वास्तविकता को समझ पा रही है या नहीं। 100 metre की technical definition administrative convenience हो सकती है, लेकिन ecological wisdom नहीं। और अगर Aravalli कमजोर पड़ी, तो उसका असर सिर्फ Rajasthan या Haryana तक सीमित नहीं रहेगा Delhi उसकी सबसे पहली कीमत चुकाएगी।
जब ओमान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘Order of Oman’ दिया, तो पता चला कि अब भारत long-term strategic partner बन चुका है। ये सम्मान किसी protocol या courtesy visit का हिस्सा नहीं था, बल्कि trust, influence और future planning की official stamp है। भारत और ओमान की दोस्ती नई नहीं है करीब 7 दशक पुराना diplomatic relationship लेकिन पिछले कुछ सालों में इसका character पूरी तरह बदल गया है। अब बात सिर्फ cultural ties या energy imports तक सीमित नहीं है। आज ये रिश्ता energy security, maritime cooperation, defence partnership, trade corridors और investment frameworks तक फैल चुका है। ओमान, खाड़ी क्षेत्र में भारत का सबसे balanced और reliable ally माना जाता है। इस सम्मान के पीछे पीएम मोदी की forward-looking foreign policy है, जिसने भारत को reactive diplomacy से निकालकर strategic diplomacy में बदला। Indo-Pacific से लेकर Indian Ocean तक, भारत अब सिर्फ presence नहीं रखता, बल्कि stability और security का stakeholder बन चुका है। ओमान के लिए भारत एक ऐसा partner है जो सिर्फ फायदा नहीं, भरोसा भी देता है। Economic angle भी उतना ही strong है। Ports, logistics, infrastructure investment और future trade agreements को लेकर दोनों देश एक long-term economic roadmap पर काम कर रहे हैं। ओमान भारत को एक growth engine के तौर पर देख रहा है, जबकि भारत के लिए ओमान पश्चिम एशिया का strategic gateway बनता जा रहा है। Bottom line ये है कि ‘Order of Oman’ एक सम्मान नहीं, एक statement है। Statement ये कि भारत अब global table पर invitee नहीं, decision-maker की तरह बैठा है। और ये अवॉर्ड उसी बदलते भारत की पहचान है जो diplomacy को headlines के लिए नहीं, impact के लिए करता है।