क्या महाराष्ट्र के शहर अब पारंपरिक राजनीति से आगे निकल चुके हैं? क्या नगर निकाय चुनाव सिर्फ़ स्थानीय कामकाज तक सीमित रह गए हैं या अब ये बड़े चुनावों का संकेत देने लगे हैं? और सबसे अहम सवाल क्या शहरी वोटर अब भावनाओं से नहीं, बल्कि performance & control के आधार पर फैसला कर रहा है? महाराष्ट्र के हालिया नगर निकाय चुनावों ने इन सवालों को और तेज़ कर दिया है। इन नतीजों से साफ़ हो गया है कि राज्य की शहरी राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ़ Bharatiya Janata Party ने लगभग पूरे राज्य में अपनी मज़बूत मौजूदगी दर्ज कराई, वहीं दूसरी तरफ़ All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen AIMIM ने कुछ इलाकों में ऐसा प्रदर्शन किया, जिसकी पहले उम्मीद कम ही की जा रही थी। सबसे ज़्यादा नज़रें टिकी थीं Brihamumbai Municipal Corporation BMC चुनाव पर, जिसे देश का सबसे अमीर नगर निकाय माना जाता है। 227 वार्डों वाली इस निगम में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। यह नतीजा सिर्फ़ आंकड़ों की जीत नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि मुंबई का मतदाता अब राजनीतिक विरासत से ज़्यादा स्थिर प्रशासन और मजबूत पकड़ को महत्व दे रहा है। उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना को 65 सीटें मिलीं, जबकि शिंदे गुट 29 वार्डों तक सीमित रह गया। कांग्रेस का प्रदर्शन और कमजोर रहा और उसे केवल 24 सीटों से संतोष करना पड़ा। इसी बीच AIMIM ने मुंबई में 8 वार्ड जीतकर यह बता दिया कि वह अब केवल हाशिये की पार्टी नहीं रही। मुबई से बाहर तस्वीर और भी साफ़ हो जाती है। पूरे महाराष्ट्र में नगर निगमों और नगर परिषदों को मिलाकर देखें तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने 1,300 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाई। कई शहरों में पार्टी या तो साफ़ बहुमत में आई या सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। मीरा-भायंदर जैसे इलाकों में भाजपा की जीत लगभग एकतरफ़ा रही, जिससे यह संकेत मिला कि शहरी ही नहीं, बल्कि अर्ध-शहरी इलाकों में भी पार्टी की संगठनात्मक पकड़ मज़बूत होती जा रही है।
इन चुनावों की दूसरी बड़ी कहानी AIMIM का उभार है। पार्टी ने राज्यभर में लगभग 125 से अधिक वार्डों में जीत दर्ज की। मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र के कई शहर जैसे छत्रपति संभाजीनगर, मालेगांव, नांदेड़, अमरावती और धुले में AIMIM ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इन इलाकों में उसका बढ़ता असर सीधे तौर पर कांग्रेस और कुछ हद तक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर असर डालता दिखा। इन नतीजों से यह भी साफ़ होता है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति धीरे-धीरे दो ध्रुवों की ओर बढ़ रही है। एक तरफ़ भाजपा है, जो विकास, प्रशासन और मज़बूत संगठन के मुद्दे पर आगे बढ़ रही है। दूसरी तरफ़ AIMIM है, जो कुछ चुनिंदा इलाकों में पहचान आधारित राजनीति के ज़रिए अपनी जगह बना रही है। इसके बीच कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल न तो कोई साफ़ दिशा दिखा पाए और न ही शहरी मतदाता को जोड़ पाने में सफल रहे। शहरी वोटर अब निर्णायक भूमिका में है, और जो दल इस बदलती सोच को समय रहते नहीं समझ पाएंगे, उनके लिए आगे की राह और कठिन हो सकती है।