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Breaking News 17 December 2025

1 )  VB-G RAM-G बिल क्या है ? विपक्ष क्यों नाराज़ ?

क्या ग्रामीण भारत से ‘काम का अधिकार’ छीना जा रहा है, या इसे नए नाम में नया भविष्य दिया जा रहा है? संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया गया VB-G RAM-G Bill इसी सवाल के इर्द-गिर्द देश की राजनीति, संसद और ग्रामीण भारत को दो हिस्सों में बाँटता दिख रहा है। सरकार इसे Reform बता रही है, जबकि विपक्ष इसे Rollback of Rights कह रहा है। सवाल यह नहीं है कि नाम बदला गया या नहीं, सवाल यह है कि ग्रामीण रोज़गार की आत्मा बदली जा रही है या मज़बूत की जा रही है? VB-G RAM-G Bill, जिसका पूरा नाम Viksit Bharat   Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Bill, 2025 है, को केंद्र सरकार ने MGNREGA (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) के स्थान पर पेश किया है। यह बिल 16 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश हुआ, लेकिन अभी यह कानून नहीं बना है। संसद की मंज़ूरी, राज्यसभा की सहमति और राष्ट्रपति के Assent के बाद ही यह लागू हो सकेगा। फिलहाल यह एक Proposed Legislation है, जिस पर तीखी बहस जारी है। सरकार का तर्क है कि MGNREGA, जो वर्ष 2005 में लागू हुआ था, अब बदलते ग्रामीण परिदृश्य के अनुरूप नहीं है। सरकार के अनुसार ग्रामीण भारत में अब केवल Wage Employment नहीं, बल्कि Livelihood Creation, Skill Development, Infrastructure Support और Climate-linked Works की ज़रूरत है। इसी सोच के तहत Employment Guarantee को Employment + Livelihood Mission में बदलने की बात कही जा रही है। सरकार का दावा है कि यह बिल “Viksit Bharat Vision 2047” के अनुरूप है। इस नए बिल में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव यह है कि जहां MGNREGA में हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 Days of Guaranteed Employment मिलता था, वहीं VB-G RAM-G Bill में इसे बढ़ाकर 125 Days करने का प्रस्ताव है। पहली नज़र में यह एक Pro-Worker Move लगता है, लेकिन असली विवाद इसके Framework को लेकर है। पहले यह योजना पूरी तरह Demand-Driven थी, यानी काम मांगने पर सरकार को काम देना कानूनी रूप से बाध्य था। नए बिल में इसे Planned Allocation Model की ओर ले जाने की बात कही जा रही है, जहां राज्यों को पहले से तय बजट और कार्य दिए जाएंगे। यहीं से विपक्ष का विरोध शुरू होता है। विपक्ष का कहना है कि Right-Based Legislation को धीरे-धीरे Scheme-Based Model में बदला जा रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे ग्रामीण मजदूर का Legal Right to Work कमजोर होगा और रोजगार सरकार की इच्छा पर निर्भर हो जाएगा। विपक्ष इसे Dilution of Employment Guarantee बता रहा है। विवाद का दूसरा बड़ा कारण है नाम परिवर्तन। MGNREGA में Mahatma Gandhi का नाम शामिल था, जो इसे सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि एक Ideological Commitment बनाता था। नए नाम में गांधी का नाम हटाकर VB-G RAM-G रखा गया है। विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि Symbolic Politics है। कुछ दलों ने यह भी कहा कि “RAM” शब्द का प्रयोग राजनीतिक और वैचारिक संदेश देता है, जो संविधान की भावना के विपरीत है। तीसरा अहम विवाद Funding Pattern को लेकर है। अभी तक MGNREGA में केंद्र सरकार मजदूरी का लगभग पूरा बोझ उठाती थी। नए बिल में Centre-State Cost Sharing को बदलकर 60:40 Model की ओर ले जाने का संकेत है। विपक्ष का कहना है कि इससे गरीब और पिछड़े राज्यों पर अतिरिक्त Fiscal Burden पड़ेगा और योजना का प्रभाव कमजोर होगा। यह मुद्दा खासतौर पर गैर-बीजेपी शासित राज्यों में चिंता का विषय बन गया है। सरकार का पक्ष यह है कि VB-G RAM-G Bill केवल रोजगार नहीं, बल्कि Sustainable Livelihood Ecosystem तैयार करेगा। सरकार बेहतर Digital Monitoring, Geo-Tagging of Assets, Skill-linked Works और Outcome-Based Implementation की बात कर रही है। दावा किया जा रहा है कि इससे फर्जी जॉब कार्ड, देरी से भुगतान और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं पर रोक लगेगी। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि असली परीक्षा Implementation की होगी। अगर Demand-Driven Nature कमजोर होती है, तो ग्रामीण गरीबों के लिए यह कानून सिर्फ कागज़ी बनकर रह सकता है। दूसरी ओर, अगर अतिरिक्त रोजगार दिवस, बेहतर निगरानी और आजीविका-आधारित काम ज़मीन पर उतरे, तो यह ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। फिलहाल सच्चाई यह है कि VB-G RAM-G Bill न तो कानून बना है और न ही MGNREGA खत्म हुआ है। लेकिन इतना तय है कि यह बिल केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की सामाजिक सुरक्षा संरचना को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है। सवाल यही है क्या यह ‘Viksit Bharat’ की ओर कदम है, या फिर ग्रामीण गरीबों के सबसे बड़े अधिकार में कटौती? इसका जवाब संसद की बहस, संशोधनों और ज़मीनी अमल में छिपा है।

 

2 )  National Herald Case Sparks Congress Protests

नेशनल हेराल्ड केस एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में है। दिल्ली की विशेष अदालत द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की मनी लॉन्ड्रिंग चार्जशीट को स्वीकार न किए जाने के बाद कांग्रेस ने इसे “सत्य की जीत” करार दिया, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने साफ कहा कि मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। इसी फैसले के बाद लखनऊ, अहमदाबाद समेत देश के कई शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया, जिसे पार्टी ने ‘हल्ला बोल’ नाम दिया। अदालत का यह फैसला तकनीकी और कानूनी आधार पर आया है। कोर्ट ने ED की चार्जशीट को इस स्तर पर स्वीकार करने से इनकार किया, यह कहते हुए कि मनी लॉन्ड्रिंग का केस तभी टिक सकता है जब उससे जुड़ा  predicate offence विधिवत दर्ज हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को झूठा करार दे दिया है, बल्कि इतना स्पष्ट किया है कि मौजूदा प्रक्रिया में ED की चार्जशीट को संज्ञान में नहीं लिया जा सकता। कानूनी तौर पर यह गांधी परिवार को तात्कालिक राहत है, लेकिन मामले का अंत नहीं। इस फैसले के तुरंत बाद कांग्रेस ने देशव्यापी प्रतिक्रिया दी। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि नेशनल हेराल्ड केस राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है और केंद्र सरकार एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। कांग्रेस का दावा है कि वर्षों से चल रहे इस मामले में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया, फिर भी गांधी परिवार को बार-बार निशाना बनाया गया। इसी आक्रोश के तहत लखनऊ, अहमदाबाद, चंडीगढ़, रायपुर सहित कई शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे, नारेबाज़ी की और कई जगह पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में भी लिया।

लखनऊ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए ED की कार्रवाई को “लोकतंत्र पर हमला” बताया। अहमदाबाद में भी कांग्रेस की ओर से मार्च और विरोध प्रदर्शन किए गए, जहां कुछ स्थानों पर पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की खबरें आईं। कांग्रेस का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि विपक्ष की आवाज़ को दबाने के खिलाफ है। दूसरी ओर, बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि अदालत ने यह नहीं कहा है कि गांधी परिवार निर्दोष है, बल्कि केवल प्रक्रिया से जुड़ा सवाल उठाया है। बीजेपी का दावा है कि कानून अपना काम कर रहा है और कांग्रेस जानबूझकर अदालत के आदेश को राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर रही है ताकि जनता को भ्रमित किया जा सके। पार्टी ने यह भी दोहराया कि नेशनल हेराल्ड केस अभी अदालत में है और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। अगर मामले की जड़ में जाएं तो नेशनल हेराल्ड केस की शुरुआत 2012 में हुई थी। यह मामला एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड से जुड़ा है, जो नेशनल हेराल्ड अख़बार प्रकाशित करती थी। आरोप है कि कांग्रेस से जुड़ी संस्था ‘यंग इंडियन’ के जरिए AJL की संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल किया गया। इसी कथित लेन-देन को लेकर टैक्स और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप सामने आए, जिनकी जांच ED कर रही है। कांग्रेस शुरू से यह कहती रही है कि इसमें कोई निजी लाभ नहीं लिया गया और यह पूरी तरह गैर-लाभकारी व्यवस्था थी। राजनीतिक रूप से यह मामला सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं है। संसद, सड़क और मीडिया तीनों मोर्चों पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने हैं। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग का उदाहरण बता रही है, जबकि बीजेपी इसे कानून के सामने जवाबदेही का सवाल कहती है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि ED आगे क्या कानूनी कदम उठाती है और अदालत इस मामले में किस दिशा में बढ़ती है।