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Breaking News 15 January 2026

1 )  ईरान में फंसे सैकड़ों भारतीय छात्र : युद्ध जैसे हुए हालात

मध्य-पूर्व एक बार फिर तनाव की आग में घिरा है और इस आग की लपटें अब सीधे भारत के सैकड़ों परिवारों की चिंता बन चुकी हैं। ईरान में पढ़ाई कर रहे सैकड़ों भारतीय छात्र मौजूदा हालात में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। क्षेत्रीय संघर्ष, सैन्य गतिविधियों की आशंका और आंतरिक अस्थिरता के बीच इन छात्रों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है अगर हालात और बिगड़े, तो क्या वे सुरक्षित भारत लौट पाएंगे? ईरान इस वक्त कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। एक तरफ ईरान-इज़राइल तनाव और अमेरिका की सख्त चेतावनियां हैं, तो दूसरी ओर देश के भीतर आर्थिक संकट, महंगाई और विरोध प्रदर्शनों की खबरें सामने आ रही हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में विदेशी नागरिक, खासकर छात्र, सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं। फ्लाइट सेवाओं की अनिश्चितता, एयरस्पेस बंद होने की आशंका और संचार व्यवस्था पर संभावित असर ने इन छात्रों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। ईरान में मौजूद भारतीय छात्रों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि 500 से 700 के बीच भारतीय छात्र वहां पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या मेडिकल और टेक्निकल कोर्स करने वाले छात्रों की है। कम फीस और आसान दाख़िले के कारण पिछले कुछ वर्षों में ईरान भारतीय छात्रों के लिए एक विकल्प के तौर पर उभरा, लेकिन मौजूदा हालात ने इस फैसले को उनके लिए संकट में बदल दिया है। कई छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके पास अचानक विदेश से बच्चों को वापस लाने के आर्थिक साधन नहीं हैं। छात्रों और उनके परिजनों की चिंता अब खुलकर सामने आने लगी है। सोशल मीडिया और निजी बातचीत में छात्र यह कह रहे हैं कि विश्वविद्यालयों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, हॉस्टल खाली करने का दबाव बढ़ रहा है और हालात तेजी से बदल रहे हैं। कुछ छात्रों ने यह भी बताया कि अगर स्थिति बिगड़ी तो फ्लाइट मिलना लगभग असंभव हो सकता है। डर सिर्फ पढ़ाई रुकने का नहीं, बल्कि अपनी जान-माल की सुरक्षा का है। इसी बीच असदुद्दीन ओवैसी ने इस मुद्दे को उठाते हुए केंद्र सरकार से साफ मांग की है कि बिना देरी किए ईरान में फंसे भारतीय छात्रों के लिए तुरंत इवैक्यूएशन प्लान तैयार किया जाए। ओवैसी का कहना है कि सरकार को सिर्फ हालात पर नजर रखने के बयान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ज़मीनी स्तर पर ठोस तैयारी करनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले यूक्रेन, सूडान और अफगानिस्तान जैसे संकटों में भारत ने अपने नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला था, तो ईरान के मामले में भी वही तत्परता दिखनी चाहिए। इस पूरे मामले में केंद्र सरकार की जिम्मेदारी और भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और संवैधानिक दायित्वों के तहत विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है। अब तक सरकार की ओर से यह जरूर कहा गया है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और ईरान स्थित भारतीय दूतावास छात्रों के संपर्क में है, लेकिन किसी ठोस इवैक्यूएशन टाइमलाइन या प्लान की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। यही अनिश्चितता छात्रों और उनके परिवारों की बेचैनी को और बढ़ा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि संकट की घड़ी में देर सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। अगर हालात अचानक बिगड़ते हैं, एयरस्पेस बंद हो जाता है या हिंसा फैलती है, तो सुरक्षित निकासी कहीं ज्यादा मुश्किल हो सकती है। ऐसे में पहले से तैयार इवैक्यूएशन प्लान न सिर्फ जान बचा सकता है, बल्कि सरकार पर बाद में आने वाले राजनीतिक और नैतिक दबाव को भी कम कर सकता है। यह मामला अब सिर्फ विदेश नीति या कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे मानव सुरक्षा और भरोसे का सवाल बन चुका है। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की उम्मीद में विदेश भेजा, वे आज हर खबर के साथ डर और उम्मीद के बीच झूल रहे हैं। सवाल यही है कि क्या सरकार हालात बिगड़ने का इंतजार करेगी, या समय रहते पहल करके यह भरोसा देगी कि हर भारतीय नागरिक, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में हो, देश के लिए अहम है।