संसद भवन परिसर में 14 अप्रैल का दिन औपचारिक श्रद्धांजलि से कहीं आगे बढ़कर एक व्यापक राजनीतिक और संस्थागत संदेश के रूप में सामने आया। अवसर था डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती का, और देश के शीर्ष नेतृत्व ने उनकी विरासत को याद करते हुए संविधान की मूल भावना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद परिसर स्थित प्रेरणा स्थल पर बाबासाहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस दौरान केंद्रीय मंत्रियों, विभिन्न दलों के सांसदों, पूर्व सांसदों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को एक व्यापक प्रतिनिधित्व दिया जहां सत्ता और विपक्ष के बीच की राजनीतिक रेखाएं प्रतीकात्मक रूप से धुंधली नजर आईं। श्रद्धांजलि का दूसरा चरण संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित हुआ, जहां एक बार फिर शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति दर्ज हुई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने बाबासाहेब के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह उपस्थिति केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि उस संवैधानिक ढांचे के प्रति सामूहिक स्वीकार्यता का संकेत भी थी, जिसकी आधारशिला अम्बेडकर ने रखी थी। इस अवसर पर आयोजित ‘Know Your Leader’ कार्यक्रम में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए ओम बिरला ने डॉ. अम्बेडकर के जीवन को संघर्ष, अनुशासन और वैचारिक स्पष्टता का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर ने अपनी शिक्षा, प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के बल पर न केवल व्यक्तिगत सीमाओं को पार किया, बल्कि समाज के उन वर्गों के लिए भी रास्ते खोले, जो लंबे समय तक अवसरों से वंचित रहे। ओम बिरला ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान में निहित समानता का अधिकार और सार्वभौमिक मताधिकार जैसे प्रावधान केवल कानूनी व्यवस्थाएं नहीं हैं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस कदम हैं। उनके अनुसार, यही प्रावधान भारत के लोकतंत्र को संस्थागत मजबूती प्रदान करते हैं और वैश्विक स्तर पर भी एक संतुलित लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में स्थापित करते हैं। युवाओं की भूमिका पर बात करते हुए उन्होंने ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत की प्रगति केवल नीतियों से नहीं, बल्कि युवाओं की क्षमता, नवाचार और जिम्मेदारी की भावना से तय होगी। इस संदर्भ में उन्होंने अम्बेडकर के विचारों को आज की पीढ़ी के लिए प्रासंगिक और मार्गदर्शक बताया। सोशल मीडिया मंच X पर अपने संदेश में ओम बिरला ने डॉ. अम्बेडकर के जीवन को “महान संघर्ष की साहसिक गाथा” बताते हुए कहा कि उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा और परिश्रम के बल पर न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि करोड़ों वंचितों के लिए एक नई दिशा निर्धारित की। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता जैसे सिद्धांत आज भी भारतीय समाज और शासन व्यवस्था के केंद्र में हैं। बिरला ने संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में अम्बेडकर के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने देश को एक ऐसा दूरदर्शी दस्तावेज दिया, जो न केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देता है, बल्कि प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है। उनके अनुसार, अम्बेडकर का जीवन यह संदेश देता है कि शिक्षा, जागरूकता और संगठित प्रयासों के माध्यम से स्थायी सामाजिक परिवर्तन संभव है।