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Breaking News 14 February 2026

1 ) Rajpal Yadav Case : Manipulated Narrative ?  

क्या कानून सबके लिए बराबर है? और अगर है, तो फिर राजपाल यादव को इतना वक्त, इतनी सहानुभूति, इतनी मदद क्यों? सोशल मीडिया अक्सर स्टार को इंसान से ज्यादा किरदार की तरह पेश करता है। अगर यही केस किसी बड़े बिजनेसमैन का होता? तो हेडलाइन होती फ्रॉड डिफॉल्टर...घोटाला । नैरेटिव बदल जाता है। कॉमेडी के बादशाह, साइड रोल के सुपरस्टार, और मीम्स के प्रिय चेहरा लेकिन आज चर्चा उनके पंचलाइन की नहीं, पेमेंट लाइन की है। Rajpal Yadav पर करीब 9 करोड़ रुपये के चेक कर्ज विवाद इस समय खूब चल रहा है.....लेकिन रुकिए। क्या ये इमोशनल केस है? या फिर एक फाइनेंशियल डिफॉल्ट का मामला? क्योंकि अगर कोई आम व्यापारी, दुकानदार या मिडिल क्लास इंसान 9 करोड़ नहीं, 9 लाख भी नहीं चुका पाए तो क्या उसके लिए भी इतने फोन कॉल, इतनी गारंटी, इतना एक्स्ट्रा टाइम आता है?

ये सब होता है..अदालत की सख्ती, सरेंडर, तिहाड़ और उसके बाद बॉलीवुड की मानवता ब्रिगेड का आगे आना से....यह मामला 2012 की फिल्म Ata Pata Laapata से जुड़ती है। प्रोडक्शन और फाइनेंसिंग से जुड़े विवाद, उधार ली गई रकम, और फिर चेक बाउंस। कानून की भाषा में Negotiable Instruments Act की धारा 138। इस धारा के तहत अगर चेक बाउंस होता है और तय समय में भुगतान नहीं होता, तो मामला आपराधिक बन जाता है। सजा, जुर्माना, यहां तक कि जेल भी संभव है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुल विवादित रकम लगभग ₹9 करोड़ के आसपास बताई गई। कुछ रिपोर्ट्स में ₹2.5 करोड़ तक की आंशिक अदायगी का दावा। पहले भी उन पर बैंक डिफॉल्ट और संपत्ति विवाद के केस रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अदालत में सरेंडर किया और तिहाड़ भेजे गए। मतलब ये कोई अचानक आई मुसीबत नहीं है। ये एक लंबा चलता कानूनी अध्याय है। अब असली सवाल है कि उन्हें बेचारा क्यूँ कहा जा रहा है? सोशल मीडिया और कुछ खबरों में टोन ऐसा था जैसे इतना बड़ा कलाकार, इतनी छोटी सी गलती में फंस गया…बॉलीवुड को अपने सितारे के साथ खड़ा होना चाहिए…और फिर नाम उछला Salman Khan, Ajay Devgn, Sonu Sood कहा गया कि इंडस्ट्री मदद को आगे आई। यहां से मामला भावनात्मक मोड़ लेती है।

तो अदालत ने समय क्यों दिया? यहां थोड़ा ठंडे दिमाग से समझते हैं। धारा 138 के मामलों में समझौते की संभावना रहती है किश्तों में भुगतान का विकल्प होता है
अदालत कई बार सुलह के लिए समय देती है तो हां, कानून में समय देने का प्रावधान है। लेकिन फर्क कहां आता है? फर्क आता है संसाधनों में। बड़े वकील कानूनी रणनीति, पैसा जुटाने के लिए अमीर दोस्त,  मीडिया इमेज....आम आदमी के पास क्या होता है? बैंक का नोटिस....कलेक्शन एजेंट....और शायद एक लोकल वकील....तो क्या सच में उन्हें ज्यादा सुविधा मिली? तकनीकी रूप से देखें तो उन्हें भी केस झेलना पड़ा...उन्हें भी सरेंडर करना पड़ा....उन्हें भी जेल भेजा गया...लेकिन सवाल ये नहीं कि जेल गए या नहीं। सवाल ये है क्या उन्हें उस मुकाम तक पहुंचने में वो समय और विकल्प मिले, जो एक आम आदमी को नहीं मिलते? और जवाब शायद कड़वा है हाँ, प्रसिद्धि और नेटवर्क चीज़ें बदल देती हैं। क्या सहानुभूति गलत है? नहीं। हर इंसान गलती कर सकता है। हर इंसान आर्थिक संकट में पड़ सकता है। किसी को गिरते देख हंसना अमानवीय है। लेकिन सहानुभूति और जवाबदेही में फर्क होता है। अगर कोई 9 करोड़ का भुगतान नहीं कर पाया, तो वो संघर्षरत कलाकार है या डिफॉल्टर ? अगर आम आदमी के लिए कानून सख्त है, तो स्टार के लिए भावुक क्यों? तो बड़ा सवाल है क्या आम आदमी को भी इतना वक्त मिलना चाहिए? अगर सिस्टम में सुधार की बात करें, तो जवाब है.. हाँ हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिले सेटलमेंट का समय मिले जेल अंतिम विकल्प हो लेकिन असलियत ये है कि समान अधिकार और समान पहुंच दो अलग चीजें हैं। कानून बराबर है। लेकिन कानून तक पहुंच बराबर नहीं है। सही सवाल ये है अगर राजपाल को समय मिला तो क्या हर राजू, रमेश और रफीक को भी वही समय मिल सकता है? अगर नहीं ...तो समस्या राजपाल नहीं, खुद लोगों की मानसिकता है

 

2 ) 40 शहीद… और 7 साल बाद देश कहाँ खड़ा है?

पुलवामा के 40 शहीदों के परिवार आज कहाँ खड़े हैं और क्या 2019 के बाद आतंकवाद पर नीति में ठोस बदलाव आया या हम हर बरसी पर वही सवाल दोहराते हैं? 14 फरवरी 2019 के हमले के बाद केंद्र और राज्यों ने अलग-अलग पैकेज घोषित किए.... औसतन 20 से 50 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता, केंद्र की स्कीमों के तहत अतिरिक्त सहायता, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी, बच्चों की शिक्षा का खर्च, ज़मीनी रिपोर्टों में यह भी दर्ज हुआ कि अधिकांश परिवारों को राहत और नौकरी मिली, पर कुछ मामलों में प्रक्रिया और पोस्टिंग में देरी, दस्तावेज़ी अड़चनें और राज्यवार असमानताएँ रहीं। नीति के स्तर पर 2019 में UAPA संशोधित हुआ अब व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित किया जा सकता है... National Investigation Agency को व्यापक अधिकार मिले... और 5 अगस्त 2019 को Narendra Modi सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति बदली समर्थकों ने इसे सुरक्षा ढाँचे का निर्णायक पुनर्गठन कहा, आलोचकों ने राजनीतिक सहमति की कमी पर सवाल उठाए। जांच में NIA ने विस्तृत चार्जशीट दायर की पाकिस्तान-स्थित हैंडलर्स के नाम आए और Masood Azhar को 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक आतंकवादी घोषित किया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2020–2024 के बीच घाटी में बड़ी आतंकी घटनाओं में गिरावट का दावा किया गया, हालांकि टारगेट किलिंग्स और छोटे मॉड्यूल की चुनौती बनी रही यानी पैटर्न बदला, खतरा शून्य नहीं हुआ।जानते हैं आखिर उस दिन हुआ क्या था... 14 फरवरी 2019 को दोपहर लगभग 3:15 बजे जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर लेथपोरा पुलवामा के पास CRPF का बड़ा काफिला करीब 78 वाहन, लगभग 2500 कर्मी आगे बढ़ रहा था मौसम और मार्ग बंद रहने के कारण उस दिन काफिला अपेक्षाकृत बड़ा था। एक विस्फोटकों से लदी SUV ने काफिले की बस से टक्कर मारी और शक्तिशाली धमाका हुआ 40 जवान शहीद हुए, कई घायल हुए। जिम्मेदारी पाकिस्तान-आधारित Jaish-e-Mohammed ने ली हमलावर स्थानीय युवक था। 26 फरवरी 2019 को भारत ने बालाकोट में एयरस्ट्राइक की अगले दिन हवाई मुठभेड़ में Abhinandan Varthaman का विमान गिरा, वे पकड़े गए और 1 मार्च को रिहा हुए कूटनीतिक तनाव चरम पर पहुँचा। कई परिवारों को घोषित सहायता और नौकरी मिली, कुछ मामलों में देरी असमानता भी दिखी और सुरक्षा परिदृश्य में गिरावट-का-दावा और बदलता पैटर्न दोनों साथ मौजूद हैं।