अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार व्हाइट हाउस में पैर जमा चुके हैं, और उनके सत्ता संभालते ही दुनिया की राजनीति में फिर से हलचल मच गई है। इस बीच, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा की और ट्रंप प्रशासन के आला अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों का सिलसिला अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड से शुरू हुआ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वाल्ट्ज से होते हुए सीधे डोनाल्ड ट्रंप तक पहुंचा। लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे दिलचस्प बयान तब आया जब ट्रंप ने खुद स्वीकार कर लिया कि मोदी उनसे "कहीं अधिक कठिन और बेहतर वार्ताकार" हैं। बैठक के दौरान मोदी जी ने डोनाल्ड ट्रंप को भारत आने का न्योता दे दिया। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के लोग अभी भी उनकी 2020 की यात्रा को याद करते हैं, जब 'नमस्ते ट्रंप' कार्यक्रम हुआ था।
बैठक के बाद जारी साझा बयान में बताया गया कि दोनों नेताओं ने व्यापार और टैरिफ को लेकर लंबी बातचीत की। खास बात यह रही कि दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी टीमों को साल के अंत तक एक 'परस्पर लाभकारी' व्यापार समझौता करने का निर्देश दिया। अब यह 'लाभकारी' किसके लिए होगा, यह देखने वाली बात होगी भारत के लिए, अमेरिका के लिए, या फिर सिर्फ अमेरिका के बड़े कॉरपोरेट्स के लिए? वैसे, यह पहली बार नहीं है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिका से व्यापार की बात कर रहा हो। हर बार यही चर्चा होती है, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, और फिर दस्तावेजों में कुछ ऐसा लिखा जाता है कि भारत को ज्यादा झुकना पड़ता है। लेकिन मोदी जी ने ट्रंप को मात देने की ठान ली है आखिरकार, जब वो खुद ट्रंप से बेहतर 'सौदागर' घोषित हो चुके हैं! ट्रंप ने चीन को लेकर भी बड़ी बातें कीं। उन्होंने कहा कि अगर वह मदद कर सकते हैं, तो उन्हें खुशी होगी। उनका मानना है कि चीन, रूस और अमेरिका को मिलकर समस्याओं को सुलझाना चाहिए।
अब जब ट्रंप सत्ता में वापस आए हैं, तो उनका पुराना बयान फिर से लौट आया "अगर मैं राष्ट्रपति होता तो यह युद्ध नहीं होता!" उन्होंने साफ कहा कि रूस ने जो कुछ भी किया है, वह नहीं होना चाहिए था। उन्होंने पुतिन से कहा था कि यूक्रेन नाटो का हिस्सा नहीं बनेगा, और यही वह 'सौदा' था, जो अगर पहले हो जाता तो यह युद्ध टल सकता था। मतलब, ट्रंप खुद को 'युद्ध रोकने वाला' नेता बता रहे हैं। एक दिलचस्प सवाल यह भी उठा कि क्या मोदी और ट्रंप की मुलाकात में भारतीय उद्योगपति गौतम अदाणी के खिलाफ मामलों पर चर्चा हुई? इस पर मोदी जी का जवाब था "भारत एक लोकतंत्र है और हमारी संस्कृति 'वसुधैव कुटुंबकम' है।" यानी, अदाणी पर चर्चा हो या न हो, भारत का लोकतंत्र हर किसी को अपने अंदर समाहित कर लेता है |
दिल्ली की राजनीति में 27 साल बाद इतिहास दोहराया गया। बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल कौन बनेगा मुख्यमंत्री? दिल्ली की सत्ता संभालते ही बीजेपी बड़ा फैसला लेने की तैयारी में है, और पहला निशाना मोहल्ला क्लीनिक पर है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक को "आयुष्मान आरोग्य मंदिर" में बदलने की योजना बना रही है। यानी अब इलाज मुफ्त तो रहेगा, लेकिन आयुष्मान भारत योजना के दायरे में। इसका मतलब यह हुआ कि दिल्ली सरकार की बजाय अब केंद्र सरकार की नीति से इनका संचालन होगा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिल्ली सरकार से इन क्लीनिकों की वर्तमान स्थिति, सेवाओं और भ्रष्टाचार के आरोपों पर रिपोर्ट मांगी है। जनवरी में दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने मोहल्ला क्लीनिक में फर्जी डायग्नोस्टिक टेस्ट के आरोपों की CBI जांच के आदेश दिए थे। कहा गया कि प्राइवेट लैब्स को फायदा पहुंचाने के लिए हजारों टेस्ट फर्जी तरीके से करवाए गए। बीजेपी सरकार बनने के बाद इन मामलों पर सख्त एक्शन लिए जाने की संभावना है। दिल्ली उन चुनिंदा राज्यों में से एक है, जहां आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) लागू नहीं थी। पश्चिम बंगाल भी इस योजना से बाहर था। लेकिन अब 51 लाख दिल्लीवासियों को आयुष्मान भारत कार्ड दिए जाने की योजना है। अगर मोहल्ला क्लीनिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर में बदले जाते हैं, तो इन्हें इस योजना के गाइडलाइन्स का पालन करना होगा।
बीजेपी के 48 विधायकों में से 15 नाम शॉर्टलिस्ट किए गए हैं। इनमें से 9 को मुख्यमंत्री, मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए चुना जाएगा। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में सीएम पद के लिए नाम 17 या 18 फरवरी को फाइनल हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16 फरवरी की रात विदेश दौरे से लौटेंगे, जिसके बाद गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक होगी। हालांकि सवाल ये उठता है कि आयुष्मान भारत लागू होने से दिल्ली के गरीबों को फायदा होगा या नए नियमों से उलझन बढ़ेगी? बीजेपी का नया सीएम कौन होगा, और क्या वह दिल्ली के पुराने मुद्दों को हल कर पाएगा? अब सबकी नजरें 17-18 फरवरी पर टिकी हैं। बीजेपी का दिल्ली में अगला कदम क्या होगा? फैसला जल्द ही आपके सामने होगा!
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री के साथ कुल सात मंत्री शपथ ले सकते हैं। इसके अलावा, जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधते हुए एक उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने पर भी मंथन जारी है। दिल्ली सचिवालय से मिली जानकारी के अनुसार, सरकार बनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुख्य सचेतक, उप सचेतक, दिल्ली जल बोर्ड, महिला आयोग और दिल्ली विकास प्राधिकरण सहित विभिन्न विभागों में नियुक्तियों की प्रक्रिया भी जल्द शुरू हो सकती है। प्रशासनिक स्तर पर रिक्त पदों की सूची मांगी गई है और प्रधानमंत्री कार्यालय भी इन नियुक्तियों पर पैनी नजर बनाए हुए है। शपथ ग्रहण समारोह के लिए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम को प्राथमिकता दी जा रही है। सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था, पार्किंग और क्षमता को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के अधिकारी स्टेडियम का निरीक्षण कर चुके हैं। इसमें एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और राज्यपालों की उपस्थिति तय मानी जा रही है। अरुण जेटली स्टेडियम को भी एक संभावित विकल्प के रूप में रखा गया है। हालांकि, आयोजन स्थल को अंतिम रूप देने से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों से सुरक्षा क्लियरेंस लिया जाएगा।