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Breaking News 12 March 2026

1 ) The Dark Side of Artificial Intelligence

कहते हैं हर दौर की अपनी एक मशीन होती है जो इंसान को आईना दिखाती है। कभी भाप का इंजन आया तो मजदूरों को लगा कि कारखाने उनकी जगह ले लेंगे, फिर कंप्यूटर आया तो दफ्तरों में यह डर फैल गया कि अब इंसान की जरूरत ही नहीं रहेगी। लेकिन इतिहास का पहिया यहीं नहीं रुका और अब वही सवाल एक नई तकनीक के सामने खड़ा है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी AI। फर्क बस इतना है कि इस बार मशीन सिर्फ हाथों का काम नहीं बल्कि दिमाग का काम भी सीख रही है। यही वजह है कि दुनिया भर में यह बहस तेज हो गई है कि आने वाले वर्षों में AI इंसानों की कितनी नौकरियाँ छीन सकता है और कितनी नई नौकरियाँ पैदा करेगा। पिछले कुछ वर्षों में AI ने जिस रफ्तार से प्रगति की है, उसने पत्रकारिता, बैंकिंग, डिजाइन, प्रोग्रामिंग, ग्राहक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और रिसर्च जैसे कई क्षेत्रों को सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इसी बदलती तस्वीर को देखते हुए वैश्विक निवेश बैंक Goldman Sachs ने अपनी एक चर्चित रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि AI और ऑटोमेशन भविष्य में दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ नौकरियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सभी नौकरियाँ पूरी तरह खत्म हो जाएँगी, बल्कि कई काम ऐसे होंगे जिन्हें मशीनें तेज़ और सस्ते तरीके से करने लगेंगी। इसी तरह वैश्विक मंच World Economic Forum की “Future of Jobs” रिपोर्ट के अनुसार 2027 तक AI और ऑटोमेशन के कारण करीब 8.3 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं, लेकिन उसी अवधि में लगभग 6.9 करोड़ नई नौकरियाँ भी पैदा होने की संभावना है। यानी तस्वीर पूरी तरह काली नहीं है; यह बदलाव का दौर है जिसमें पुराने काम खत्म होंगे और नए काम पैदा होंगे। वहीं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था International Monetary Fund का आकलन है कि दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत नौकरियाँ किसी न किसी रूप में AI से प्रभावित होंगी, खासकर वे पेशे जो डेटा, विश्लेषण, लिखने-पढ़ने या डिजिटल काम से जुड़े हैं। दिलचस्प बात यह है कि AI का असर सिर्फ कम स्किल वाली नौकरियों पर नहीं बल्कि कई हाई-स्किल पेशों पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर, डेटा एनालिसिस, ग्राहक सेवा, लीगल रिसर्च, मेडिकल रिपोर्टिंग और यहाँ तक कि कंप्यूटर कोडिंग जैसे क्षेत्रों में भी AI तेजी से घुसपैठ कर रहा है। कई कंपनियाँ अब ऐसे AI टूल्स इस्तेमाल कर रही हैं जो मिनटों में रिपोर्ट लिख सकते हैं, ग्राहक के सवालों का जवाब दे सकते हैं या बड़े डेटा का विश्लेषण कर सकते हैं वह काम जिसके लिए पहले इंसानों की पूरी टीम लगती थी। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। टेक इंडस्ट्री का तर्क है कि AI को सिर्फ “नौकरी खत्म करने वाली मशीन” के रूप में देखना अधूरी समझ है, क्योंकि हर तकनीकी क्रांति की तरह यह भी नए उद्योग और नए पेशे पैदा कर रही है। कुछ साल पहले तक “प्रॉम्प्ट इंजीनियर”, “AI ट्रेनर”, “मशीन लर्निंग स्पेशलिस्ट” या “डेटा एथिक्स एक्सपर्ट” जैसी नौकरियों का नाम भी शायद ही किसी ने सुना होगा, लेकिन आज ये तेजी से उभरते पेशे बन चुके हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह बदलाव और भी अहम है क्योंकि यहाँ युवा आबादी बहुत बड़ी है और डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है। अगर शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग सही दिशा में होती है तो AI भारत के लिए खतरा नहीं बल्कि बड़ा अवसर भी बन सकता है। लेकिन अगर कौशल विकास पीछे रह गया तो वही तकनीक बेरोजगारी का नया संकट भी पैदा कर सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ बार-बार यह कहते हैं कि आने वाले दशक में असली सवाल यह नहीं होगा कि AI कितनी नौकरियाँ खत्म करेगा, बल्कि यह होगा कि इंसान अपनी स्किल कितनी तेजी से बदल सकता है। इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति पहले डर पैदा करती है और फिर धीरे-धीरे नई दुनिया बनाती है।

 

2 ) Right To Die: Harish Rana Case

13 साल…इतना लंबा समय किसी इंसान के लिए इंतजार का भी हो सकता है और पीड़ा का भी।गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 13 सालों से वो कोमा में थे। साल 2013 में चंडीगढ़ में एक हादसा हुआ एक इमारत की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनके सिर में इतनी गंभीर चोट लगी कि उनका दिमाग गहरे आघात में चला गया। डॉक्टरों ने उस स्थिति को कहा Permanent Vegetative State यानी शरीर जिंदा है, दिल धड़क रहा है, लेकिन चेतना लगभग खत्म हो चुकी है। उस दिन के बाद से लेकर आज तक… हरीश राणा ने आंखें खोलकर दुनिया को नहीं देखा। उन्होंने अपने माता-पिता से कोई बात नहीं की। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने कोई शिकायत भी नहीं की। लेकिन उनके माता-पिता… हर दिन उनके पास रहे। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे अपने बेटे को देखते हुए… मशीनों की आवाज़ों के बीच… साल दर साल। समय बीतता गया एक साल… दो साल… पांच साल… और फिर पूरा एक दशक। डॉक्टरों ने कई बार इलाज किया, कोशिशें कीं, लेकिन हर रिपोर्ट लगभग एक ही बात कहती रही  अब सुधार की संभावना लगभग नहीं के बराबर है। इस बीच हरीश राणा का शरीर मशीनों के सहारे जीवित था। कृत्रिम पोषण, मेडिकल सपोर्ट और लगातार निगरानी यही उनकी जिंदगी बन चुकी थी। और फिर एक दिन उनके माता-पिता ने वह फैसला लिया, जो शायद दुनिया का सबसे कठिन फैसला होता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अदालत से कहा  हम अपने बेटे से प्यार करते हैं… लेकिन हम उन्हें इस हालत में हमेशा के लिए कैद नहीं रखना चाहते। अगर जिंदगी लौट नहीं सकती… तो उन्हें गरिमा के साथ जाने दीजिए। यह सिर्फ एक कानूनी याचिका नहीं थी। यह 13 साल की पीड़ा, उम्मीद, थकान और टूटे हुए दिल की कहानी थी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने इस मामले को गंभीरता से सुना। मेडिकल रिपोर्ट मंगाई गईं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय ली गई। एक मेडिकल बोर्ड ने जांच कर यह पुष्टि की कि हरीश राणा की स्थिति स्थायी और लगभग लाइलाज है। इसके बाद अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी। कोर्ट ने कहा अगर कोई इंसान ऐसी हालत में है जहां इलाज की कोई उम्मीद नहीं बची… और वह लंबे समय से सिर्फ मशीनों के सहारे जीवित है… तो उसे “Right to Die with Dignity” यानी गरिमा के साथ मरने का अधिकार मिलना चाहिए। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को Passive Euthanasia यानी इच्छामृत्यु  की अनुमति दे दी। इसका मतलब यह नहीं कि डॉक्टर उन्हें कोई घातक इंजेक्शन देंगे। बल्कि इसका मतलब है कि जो मशीनें और कृत्रिम मेडिकल सपोर्ट उन्हें जिंदा रख रहे हैं उन्हें हटाया जा सकता है। कोर्ट ने आदेश दिया कि हरीश राणा को AIIMS दिल्ली के पेलिएटिव केयर विभाग में शिफ्ट किया जाए। वहां डॉक्टरों की निगरानी में धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया जाएगा, ताकि उन्हें किसी तरह का दर्द या तकलीफ न हो। सुनवाई के दौरान अदालत ने हरीश राणा के माता-पिता के बारे में एक भावुक टिप्पणी भी की। जजों ने कहा सबसे कठिन समय में किसी की देखभाल करना ही सच्चे प्रेम की पहचान है।यह शब्द सिर्फ अदालत की टिप्पणी नहीं थे…यह उन माता-पिता की 13 साल की तपस्या का सम्मान भी था। भारत में इच्छामृत्यु का सवाल पहले भी उठ चुका है। 2011 में अरुणा शानबाग केस ने पूरे देश को इस बहस के सामने खड़ा कर दिया था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि गरिमा के साथ मरना भी संविधान के Article 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
लेकिन हरीश राणा का मामला कई मायनों में अलग है। क्योंकि यह उन दुर्लभ मामलों में से है जहां सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से जीवन-रक्षक सपोर्ट हटाने की अनुमति दी है। यह फैसला जितना कानूनी है, उतना ही मानवीय भी। एक तरफ यह इंसान की गरिमा की बात करता है। दूसरी तरफ यह एक बेहद कठिन सवाल भी छोड़ जाता है  क्या किसी इंसान को अनंत पीड़ा में जिंदा रखना सही है? या फिर उसे शांति से जाने देना ही असली करुणा है? शायद इसका जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है।