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Breaking News 12 February 2026

1 ): सरकार का बड़ा फैसला: अब हर इवेंट में होगा वंदे मातरम्

दिल्ली की सत्ता से निकला एक सरकारी आदेश आया है वंदे मातरम् को लेकर..... केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि अब सार्वजनिक और सरकारी समारोहों में वंदे मातरम् के सभी छह छंद अनिवार्य होंगे। मतलब अब न चयन, न कटौती, न सुविधा के हिसाब से छोटा वर्ज़न पूरा गीत, पूरे सम्मान के साथ, खड़े होकर होगा। यह फैसला सुनने में जितना सीधा लगता है, असल में उतना ही पेचीदा है, क्योंकि वंदे मातरम् भारत में सिर्फ़ एक गीत नहीं, एक इतिहास है, एक भावना है और एक विवाद भी। सरकारी आदेश के मुताबिक़, स्कूलों से लेकर सरकारी कार्यक्रमों तक, राष्ट्रपति और राज्यपाल के आगमन-प्रस्थान से लेकर नागरिक सम्मान समारोहों तक हर जगह अब वही नियम लागू होगा। जहां वंदे मातरम् और राष्ट्रगान दोनों होंगे, वहां पहले वंदे मातरम् और फिर ‘जन-गण-मन’ बजेगा। गीत की कुल अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड होगी और इस दौरान उपस्थित लोगों को सम्मान में खड़ा रहना होगा। सरकार का तर्क है कि यह कदम राष्ट्रीय विरासत को पूरे रूप में सम्मान देने के लिए उठाया गया है, ताकि आज़ादी के आंदोलन से जुड़ा यह गीत अपनी मूल आत्मा के साथ सुना जाए। लेकिन जैसे ही यह आदेश सामने आया, इतिहास के पन्ने भी अपने आप खुल गए। वंदे मातरम् को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और आज़ादी की लड़ाई में यह गीत नारा बना, ताक़त बना, आंदोलन की आवाज़ बना। मगर यही गीत आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी बहस के केंद्र में रहा। 1937 में इसके कुछ छंद इसलिए अलग कर दिए गए थे, ताकि गीत को लेकर किसी धार्मिक या वैचारिक असहजता की गुंजाइश न रहे। सालों तक व्यवहार में वही छोटा संस्करण चलता रहा। अब सरकार का कहना है पूरा गीत ही असली गीत है, उसे अधूरा क्यों सुना जाए? यहीं से राजनीति और विचारधारा की लाइन खिंच जाती है। सरकार इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता से जोड़कर देख रही है। उसके मुताबिक़, अगर राष्ट्रगान पूरे सम्मान के साथ बज सकता है, तो राष्ट्रीय गीत को भी उसी स्तर पर रखा जाना चाहिए। दूसरी तरफ़ आलोचक सवाल उठा रहे हैं क्या यह फैसला सिर्फ़ सांस्कृतिक सम्मान तक सीमित है, या फिर एक ऐसे मुद्दे पर सख़्त रेखा खींचने की कोशिश है, जो पहले से ही संवेदनशील रहा है? उनका तर्क है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल जोड़ने के लिए होना चाहिए, दबाव बनाने के लिए नहीं। सरकार का स्टैंड स्पष्ट है कि यह आदेश किसी समुदाय के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि विरासत के पक्ष में है। लेकिन सवाल भी उतने ही ज़ोरदार हैं कि क्या हर भावना को नियम बनाकर तय किया जा सकता है? मामला सिर्फ़ छह छंदों का नहीं है। मामला यह है कि भारत अपने अतीत को किस तरह याद करना चाहता है चुनकर, या पूरे पैकेज के साथ। वंदे मातरम् एक बार फिर गीत से आगे निकल चुका है। अब यह एक फैसला है, एक संदेश है और एक नई बहस की शुरुआत भी।

 

2 ) आज भारत बंद...क्यों ? 

नई श्रम संहिता और भारत-अमेरिका ट्रेड डील के खिलाफ देश में आज ट्रेड यूनियन और किसान संगठन सड़कों पर उतर आए और नारा लगा काम रुकेगा, तभी बात बनेगी...सरकार कह रही है ये आर्थिक सुधार हैं। मजदूर कह रहे हैं ये अधिकार छीनने की शुरुआत है। और किसान कह रहे हैं बाजार विदेशी माल से भर जाएगा। करीब 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भारत बंद बुलाया, किसान संगठनों ने समर्थन दिया और कई राज्यों में बसें रुकीं, बाजार बंद हुए, सड़कें जाम हुईं। मामला सिर्फ लेबर लॉ का नहीं...नौकरी, पेंशन, MSP और देश की आर्थिक दिशा तक पहुंच गया। ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि नए लेबर कोड कंपनियों को छूट देंगे और मजदूर कमजोर होंगे। किसानों को डर है कि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते आएंगे। असर भी दिखा सोयाबीन और मक्का के दाम गिर गए। इस पूरे आंदोलन का केंद्र सरकार के चार नए लेबर कोड्स बने। सरकार का दावा है कि ये श्रम कानून देश में निवेश बढ़ाने, रोजगार को आसान बनाने और औद्योगिक ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए जरूरी हैं। लेकिन ट्रेड यूनियनों का आरोप इससे बिल्कुल उलट है। यूनियनों का कहना है कि नए कानून कंपनियों को कर्मचारियों की छंटनी आसान बनाने की छूट देते हैं, मजदूरों की नौकरी सुरक्षा कमजोर करते हैं और न्यूनतम वेतन तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकारों को सीमित करते हैं। उनका डर है कि इससे कॉरपोरेट शक्ति मजबूत होगी और कामगार असुरक्षित हो जाएंगे। प्रदर्शनकारी सिर्फ कानून वापसी की मांग नहीं कर रहे वे पुरानी पेंशन योजना की बहाली, रोजगार की गारंटी और श्रमिक हितों की कानूनी सुरक्षा चाहते हैं। मजदूर संगठनों के लिए यह केवल नीति का सवाल नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई हैइस विरोध की दूसरी बड़ी वजह भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क बना। सरकार इसे वैश्विक व्यापार विस्तार और आर्थिक साझेदारी का बड़ा कदम बता रही है, लेकिन किसानों के लिए यह सौदा चिंता का कारण बन गया है। किसान संगठनों का आरोप है कि इस समझौते से अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते दाम पर पहुंचेंगे। अमेरिका में भारी सब्सिडी से तैयार फसलें भारत के छोटे और मध्यम किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा को असंभव बना सकती हैं। यही कारण है कि किसान संगठनों ने इसे “कृषि आत्मनिर्भरता पर खतरा” बताया है। इस डर का असर बाजार में भी दिखा। रिपोर्ट्स के मुताबिक डील की खबर सामने आने के बाद भारतीय सोयाबीन की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई, जबकि मक्का के दाम लगभग 4 प्रतिशत तक नीचे आ गए। बाजार की यह प्रतिक्रिया किसानों की आशंका को और मजबूत करती नजर आई। विवाद तब और गहरा गया जब अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी ट्रेड डील के फैक्टशीट में कुछ बिंदुओं को लेकर भ्रम पैदा हुआ। शुरुआती दस्तावेज में भारत द्वारा बड़े पैमाने पर अमेरिकी उत्पाद खरीदने जैसी बातें सामने आईं, जिन्हें बाद में संशोधित कर दिया गया। शब्दों के इस बदलाव ने सवाल खड़े कर दिए क्या सौदे की शर्तें स्पष्ट हैं? क्या देश को पूरी जानकारी दी गई? यही अनिश्चितता आंदोलन के लिए ईंधन बन गई। प्रदर्शनकारियों ने इसे आर्थिक संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया और सरकार से पारदर्शिता की मांग की। भारत बंद का असर कई राज्यों में साफ दिखाई दिया। केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, असम और कई अन्य हिस्सों में सार्वजनिक परिवहन प्रभावित हुआ, बाजार बंद रहे और कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने सड़कों को जाम कर दिया। पंजाब और हरियाणा में किसान संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया, जबकि कई शहरों में बस सेवाएं और व्यापारिक गतिविधियां ठप पड़ गईं। हालांकि कुछ राज्यों में बंद का असर सीमित रहा, लेकिन यह स्पष्ट था कि देश के अलग-अलग हिस्सों में असंतोष की तीव्रता अलग-अलग स्तर पर मौजूद है। यह विरोध एकसमान नहीं था, लेकिन व्यापक था और यही इसे महत्वपूर्ण बनाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत को एक बड़े वैचारिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक तरफ सरकार आर्थिक सुधार, वैश्विक निवेश और व्यापार विस्तार की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। दूसरी तरफ मजदूर और किसान अपने अधिकारों, रोजगार सुरक्षा और आर्थिक भविष्य को लेकर आशंकित हैं। यह सिर्फ नीति का संघर्ष नहीं, बल्कि दो अलग दृष्टिकोणों की टक्कर है विकास का मॉडल क्या हो? आखिर आर्थिक सुधार किस कीमत पर होगी ?

 

3 ) अंग्रेज़ नहीं… Partition था भारत का सबसे बड़ा दर्द

क्या 1947 की आज़ादी सिर्फ अंग्रेज़ों से आज़ादी थी?
Freedom at Midnight सीरीज यही सवाल उठाती है। इस series का core यही है कि आज़ादी एक खुशी से ज़्यादा एक दर्दनाक transition थी। ये हमें दिखाती है कि उस समय भारत की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ अंग्रेज़ नहीं थे। सबसे बड़ा संकट था Partition....एक ऐसा फैसला जिसने देश को आज़ाद तो किया, लेकिन इंसानियत को हमेशा के लिए घायल कर दिया। लाखों लोग मारे गए। करोड़ों बेघर हुए। पड़ोसी दुश्मन बन गएधर्म पहचान बन गया, इंसानियत पीछे छूट गई। यही असली tragedy थी और शायद भारत का अपना Great Depression..... Series का सबसे powerful point ये है कि ये history को hero vs villain की simple कहानी नहीं बनाती। ये दिखाती है कि उस समय decisions कितने complex थे। Mahatma Gandhi जो आखिरी समय तक देश को टूटने से बचाना चाहते थे, हिंसा रोकने के लिए अकेले खड़े थे।  Jawaharlal Nehru modern India का सपना देख रहे थे, लेकिन उन्हें political reality से समझौता करना पड़ा। Sardar Patel fragmented India को जोड़ने की practical strategy बना रहे थे। तीनों की सोच अलग थी, लेकिन लक्ष्य था एक भारत। और फिर आता है वो चेहरा जिसे series बहुत sharply दिखाती है मुहम्मद Ali Jinnah. उनकी politics, उनका distrust, और उनकी अलग राष्ट्र की मांग जिसने history का direction बदल दिया। Series ये सवाल भी छोड़ती है क्या ये सिर्फ political decision था, या उस समय के डर और नफरत का परिणाम? Freedom at Midnight की खास बात ये है कि ये सिर्फ leaders की कहानी नहीं बताती  ये आम लोगों की कहानी है। वो माँ जो border पार करते समय बच्चा खो देती है। वो परिवार जो रातों-रात refugee बन जाता है। वो ट्रेनें जो लोगों को नहीं, लाशों को लेकर आती थीं। ये visuals आपको remind करते हैं कि history सिर्फ dates नहीं होती history emotions होती है, trauma होता है, और collective memory होती है। हममें से ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि 1947 मतलब freedom from British rule. लेकिन series बताती है कि आज़ादी मिली, लेकिन unity टूट गई। देश बना, लेकिन समाज बिखर गया। सरहदें खिंचीं, लेकिन जख्म आज तक भरे नहीं। और शायद यही वजह है कि partition का असर आज भी India–Pakistan relations, communal tensions और political narratives में दिखता है। इस series को हर भारतीय को क्यों देखना चाहिए? क्योंकि ये आपको celebration के पीछे का cost समझाती है। ये आपको बताती है कि देश बनाना सिर्फ political process नहीं emotional sacrifice भी होता है। ये आपको समझाती है कि आज की identity, politics और society की जड़ें कहाँ से आईं। और सबसे important  ये आपको सोचने पर मजबूर करती है कि अगर history को सही से नहीं समझा, तो क्या हम वही गलतियाँ फिर दोहराएंगे? Freedom at Midnight आपको history नहीं सिखाती आपको history महसूस करवाती है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।